तालाब नहीं मैं कोई बरसाती,जो यूंँही सूख जाऊँगा,

तबियत से निहारोगे, तो भीड़ में भी अलग नज़र आऊँगा।


ठोकरों में रखने की तेरी कोशिश बेमानी है,

यहाँ जो है वो सब के सब आसमानी हैं,

कंकड़ की तरह न समझो मुझको

मैं भी आदमी हूँ आदमी के ही काम आऊँगा,

तालाब नहीं मैं कोई बरसाती,जो यूंँही सूख जाऊँगा,

तबियत से निहारोगे, तो भीड़ में भी अलग नज़र आऊँगा।


सोचते हो दंभ में,कि ये सारा जहान तुम्हारा है,

बस भी करो, इसमें थोड़ा सा हिस्सा हमारा है,

उड़ता हुआ 'खर' हूंँ तो क्या?

कहीं न कहीं ठहर ही जाऊँगा,

तालाब नहीं मैं कोई बरसाती,जो यूंँही सूख जाऊँगा,

तबियत से निहारोगे, तो भीड़ में भी अलग नज़र आऊँगा।।

~राजीव नयन