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संवाद मेरा


न जाने किस अदालत में दर्ज़ है वाद मेरा,फैसले के इंतज़ार में फँसा है संवाद मेरा,

धैर्य टूट रहा,पर कैसे स्वीकार करूँ मैं बंदगी?न जाने कौन से जुर्म का जुर्माना बना ये ज़िन्दगी ?

— राजीव नयन
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