अधूरी सी लगती ज़िन्दगी

थोड़ा सुकून, थोड़ी मुस्कान कोई दे दे ।

किताबों के पन्नें कुछ कोरे रह गए,

लिखनी है नई इबारत

क़लम की स्याही,उधार कोई दे दे ।


तलाशता फिर रहा मंजिले नई,

रास्ते पुराने पीछे छूट गए,

ढूंँढनी है अपनी मोहब्बत

बगीचे के पते का,इशारा कोई दे दे।


दूर क्षितिज पर नज़रें टिकाता,

ख़ुद को मैं तन्हा पाता,

बनानी है कोई संगत

टूटते तारे की, निशानी कोई दे दे ।


यूंँ तो मुक़म्मल जहाँ ही बिखरे हुए,

करनी है मुझे इबादत

ज़्यादा नहीं, थोड़ा आसमान कोई दे दे ।

अधूरी सी लगती ज़िन्दगी

थोड़ा सुकून, थोड़ी मुस्कान कोई दे दे।।

~राजीव नयन