जड़ है,आधार है पिता छाँव देते तरु के पीछे श्रम रूपी श्रृंगार है पिता। बाधाओं को सह ले पाषाण बनकर हर आँधी और हमारे बीच की मज़बूत दीवार है पिता।। थोड़ी अक्खड़पन की छद्म चादर ओढ़े पर भीतर से,हमारे लिए बेचैन मोम की तरह ख़ुद को जलाता जीवन्त क़िरदार है पिता। कभी प्यार से,कभी दुलार से तो कभी फटकार से सुन्दर मूर्ति को आकार देने में सतत लगा, सच्चा मूर्तिकार है पिता।। हम पर हुए वज्र रूपी हर प्रहार को स्वयं में सोखने को हर वक्त तैयार है पिता। हृदय में समाए हुए जज़्बातों का भंडार है पिता।। ~राजीव नयन


