बदहजमी की रोज़ शिकायत हमको

पर नये-नये पकवानों पर नित ख़र्चा करते हैं,

ड्राइंगरुम में बैठकर,कम्‍फ़‌र्टेबल‌ कपड़े पहने 

हम फटे कपड़ो पर चर्चा करते हैं।


उदासी, बेबसी के चेहरे दिखते बहुत

पर चाय की चुस्की में वाज़िब सवाल, खो जाते हैं,

हक़ीक़त से दूर कागज़ो पे 

मुश्किलों को मुस्कुराहटों में बदले जाते हैं।


कुछ ज़्यादा ही मशक्कत है ये खोजने में कि

यहांँ कितने झूठे या फिर कितने सच्चे हैं?

सड़क पर भूखे बच्चे हैं और हम ख़ोज रहे

कौन से आम पके और कौन से कच्चे हैं?


बदहजमी की रोज़ शिकायत हमको

पर नये-नये पकवानों पर ख़र्चा करते हैं,

ड्राइंगरुम में बैठकर,कम्‍फ़‌र्टेबल‌ कपड़े पहने

हम फटे कपड़ो पर चर्चा करते हैं।।

~राजीव नयन