सशंकित कालचक्र है,

संकटजनक कुचक्र है,

व्याकुल और आतंकित मन हुआ;

न जाने किस-किस की दृष्टि वक्र है।


प्रथाएँ सब टूट रही,

आस्थाएंँ सब छूट रही,

व्याकुल और व्यथित जन हुआ;

व्यवस्थाएँ ख़ाली बोतल सी फूट रही।


लाशों की क़तारें हैं,

जो नदियों के किनारे हैं,

लाचार और तिरस्कृत तन हुआ;

अनगिनत यहाँ बेसहारे हैं।


इंसानियत पीछे छूटी,

मानव की क़िस्मत रूठी,

शक्ति विहीन,भ्रमित भुवन हुआ;

उलझन में पड़ी है जड़ी-बूटी।


पर अंधकार मिटेगा निश्चित-

कई दीप जल रहें हैं अब भी

मनुष्यता को संँभाले,शुक्र है!


सशंकित कालचक्र है,

संकटजनक कुचक्र है,

व्याकुल और आतंकित मन हुआ;

न जाने किस-किस की दृष्टि वक्र है।।

~राजीव नयन