कहानी 'बाग' की वो क्या जाने?

गूंँजती 'राग' को वो क्यों मानें?

फूलों की हक़ीक़त क्या,

वो ओछी निगाहें क्या पहचानने?

तितली बन आसमां से जो करती प्यार,

सपनों संग जीने को जो रहती बेक़रार;

उसे क्या पता ?

निगाहें काली बैठी हैं घात लगाए,

कोमलता का जिसे एहसास नहीं,

वो ज़ालिम बन, हर पल कुचलने को है तैयार,

मुरझाई पंखुड़ियांँ पूछती हमसे-

दोष मेरा क्या?

क्यों मिलता मुझको ही संदेश?

क्या अंँधेरा इतना घना है?

क्यों खुलकर जीना मुझको ही मना है?


~राजीव नयन