आओ सुनो सच्ची वाणी,
आजकल की कड़वी कहानी।
स्वीच-सी बनी ज़िन्दगी;
आॕन-आॕफ़ का खेल है,
एक-दो और रिवर्स गेयर में अटकी;
कोरोना और मंहगाई का काॕकटेल है।
शिक्षा की रुकी गति,
स्वास्थ्य की हुई दुर्गति,
सरकारी भत्तों में वृद्धि
आम जनों की जेब कटी,
कितनों की शादी तारीख़ में लटकी;
तो कहीं सादा-सादी मेल है,
एक-दो और रिवर्स गेयर में अटकी;
कोरोना और मंहगाई का काॕकटेल है।
अर्थव्यवस्था है चौपट भाई,
फ़िर भी शेयर में बढ़ी कमाई,
पूंँजीपतियों की चाँदी ही चाँदी
बाकी सब की हुई घिसाई,
लाचारी में सेविंग वाली फूटी मटकी,
समय कटा कितनों का ऐसे,मानो कोई जेल है,
एक-दो और रिवर्स गेयर में अटकी;
कोरोना और मंहगाई का काॕकटेल है।
लाशों के देखे मेले हमनें!
देखा,चुनावी खेला हमनें!
अपना दुःख क्या-क्या बतलाएँ?
सरकारों तक को झेला हमनें,
रहम की आशा किससे करें?
ज़ख्मों को किस मरहम से भरें?
घायल है जीवन ऐसा;
मानो मार पड़ी है बंदूक के बट की,
समय भारी है,जैसे बिन पटरी की रेल है,
एक-दो और रिवर्स गेयर में अटकी;
कोरोना और मंहगाई का काॕकटेल है।
स्वीच-सी बनी ज़िन्दगी;
आॕन-आॕफ़ का खेल है,
एक-दो और रिवर्स गेयर में अटकी;
कोरोना और मंहगाई का काॕकटेल है।
~राजीव नयन


