कोई बिखरी कहानी है या फ़िर मेरी नादानी है,

सीढ़ियांँ चढ़ते थक गया हूंँ मैं,

यूंँ ही विचरते भटक गया हूंँ मैं,

भूल गया कि ये तो मेरी जवानी है।


बाधाओं का अथाह समंदर है,

हक़ीक़त धुंधली सी दिखती

चहुंँओर सिर्फ़ आडंबर है,

माया का फैला जाल है,

संतुष्टि का अकाल है,

सांँसें भर-भर के 

भागता फ़िर रहा ऐसा, कि भूल गया 

आख़िर किस चीज की तलाश है;

मन बहुत उदास है,

तक़दीर की कैसी ये कारस्तानी है,

ख़ुद की ही बची नहीं, कोई निशानी है।


बादल चिल्लाकर पूछ रहा-

तू क्या ख़ामोशी में ढूंँढ़ रहा?

अब न कान्हा है न मीरा कोई दिवानी है,

उलझी हुई दुनिया में हर चीज ही बेगानी है,

कोई बिखरी कहानी है

या फ़िर मेरी नादानी है,

सीढ़ियांँ चढ़ते थक गया हूंँ मैं,

यूंँ ही विचरते भटक गया हूंँ मैं,

भूल गया कि ये तो मेरी जवानी है,


~राजीव नयन