अपनी क्या बताएँ,जग ही बेहाल है,

जिधर देखो,पेड़ से टूट रही डाल है,

मज़बूर इतना देखा नहीं था इंसान को!

हवा प्रतिकूल है और अदृश्य 'काल' है।


भटक रहा दर-ब-दर सांस की तलाश में

सामने फैला मायूसियों का जाल है,

चाहता हूँ जंग शिद्दत से लड़ूं पर

सुना है अच्छे-अच्छों का बुरा हाल है,

कहां तो 'मंगल' पर बस्तियाँ बसाना चाहते हैं;

यहाँ धरती भी नहीं संभलती,कमाल है!


~राजीव नयन