लगा रोशनी की चाहत में

रोशनदान खोल दिया हमने,

पर तब शिथिलता का डेरा था;

आज फ़ैसलों का घेरा है,

कल भी अँधेरा था,आज भी अँधेरा है!

~राजीव नयन