फाल्गुन बीता,चैत का दस्तक
नये वर्ष में महासमर घनघोर है,
नफ़रत की बातें में उलझाकर
नायक बनने का होड़ है,
नैतिकता को ताखे पर रखकर
चहुंओर भागदौड़ है,
लफ़्ज़ों की सीमाएं टूटी
क्या सच है और क्या है झूठी?
माथे पर रखकर अपने हाथों को
जनता सोचे, नेता खाते कौन सी 'बूटी'?
रंगों को भी बांटा इस चुनाव ने,
अपनी 'डफ़ली' और अपने 'बाजे'का
रोज़ ही मचाता शोर है,
देखो भाई!संभल के चलना
ओछी बातों पे करना नहीं 'गौर' है,
उनकी होली आड़ी-तिरछी
हमें चलाना 'प्रेम रंग' का दौड़ है।
~राजीव नयन


