हांँ,मैं एक धुआंँ हूंँ

तेरे ऊपर

तुम्हे नहीं आऊंँगा नज़र।

तुम उलझे हो हार-जीत में

फुरसत कहांँ तुम्हे 

मुझे हटाने की,

तुम तो बेवज़ह खोए हो

आडंबर के कुरीत में,

हांँ,मैं एक धुआंँ हूंँ

तेरे ऊपर

तुम्हे नहीं आऊंँगा नज़र।

भागते-हांँफते 

खींचते-छोड़ते

कूदते-रेंगते

तुम्हे एहसास नहीं कि ऊपर

कितना छाया घना है,

तुम्हे चाहत नहीं

रोशनी पाने की,

मुझे तो आती है हंँसी

कि तू किस लिए इतना तना है,

हांँ,मैं एक धुआंँ हूंँ

तेरे ऊपर

तुम्हे नहीं आऊंँगा नज़र।

वक्त यूंँ ही चल रहा,

सूरज भी नित 

चढ़ रहा,ढ़ल रहा,

चांँद भी हर रात मचल रहा,

पर तुम्हें क्या इससे?

तू तो खुश है बस ये सोचकर कि

चलो किसी तरह तो पल रहा,

काल को थामना मुश्किल

पर बनाना अपना तो मुमकिन,

मुझे हटाओ अपने कपाल से;

वर्ना, मेरी फ़ितरत जानते ही हो

कि मैं कौन हूंँ?

हांँ,मैं एक धुआंँ हूंँ

तेरे ऊपर

तुम्हे नहीं आऊंँगा नज़र ।।

~राजीव नयन