गाँव के बाहर दरख़्त की छाँव से

गाँव को निहारते, सुकून सा मिल रहा!

जिस शहर को संँवारा था पसीने से

बेरुख़ी उसकी याद करते,दूर सा दिख रहा!

~राजीव नयन