गाँव के बाहर दरख़्त की छाँव सेगाँव को निहारते, सुकून सा मिल रहा!जिस शहर को संँवारा था पसीने सेबेरुख़ी उसकी याद करते,दूर सा दिख रहा!
गाँव के बाहर दरख़्त की छाँव सेगाँव को निहारते, सुकून सा मिल रहा!
जिस शहर को संँवारा था पसीने सेबेरुख़ी उसकी याद करते,दूर सा दिख रहा!