हम कहते हैं कि वो भीड़ लगाते हैं;

जो रोज़ कमाते और रोज़ खाते हैं ।

पर ये हमें समझना होगा कि

'समाजिक दूरी' वाला शब्द उनके लिए क्या है?

जिन्होंने ज़िन्दगी भीड़ में गुज़ार दी

उनके लिए थोड़ा नया-नया है।


सरकारी राशन की दुकानों में वो भीड़ बने,

सरकारी अस्पतालों की कतारों में वो भीड़ बने,

रोजी-रोटी की खातिर परदेशी बाज़ारों में वो भीड़ बने,

कहांँ हमने उन्हें भीड़ बनते नहीं देखा ?

भूख मिटाने की ख़ातिर श्रम की उर्जा लिए

हर चौराहे और गलियों में वो भीड़ बने,

और तो और ,नेता जी की रैलियों में वो भीड़ बने,

तो अब क्यों इतना शोर है?

समझ जाएँगे वो जल्दी ही कि

किसने उन्हें भीड़ बनाया है,

थोड़ी मुश्किल आएगी क्योंकि

'समाजिक दूरी' वाला शब्द;

उनके लिए थोड़ा नया-नया है।।

~राजीव नयन