1 min read 788.7K reads

बरसात


क्या कहूँ?वो पहले वाली बात इसबार नहीं लगती,

कहीं उदासी, कहीं भय तो कहीं ख़ामोशीबेबस चीत्कार, मुश्किलों का पहाड़

व्यवस्था का फ़रेब और बहते मकानदर्शन में अजब-गजब राजनीतिक विज्ञान

क्या कहूँ?वो ख़ूबसूरत बरसात इसबार नहीं दिखती।।

— राजीव नयन
Read more Earn more Learn more