क्या कहूँ?वो पहले वाली बात इसबार नहीं लगती,कहीं उदासी, कहीं भय तो कहीं ख़ामोशीबेबस चीत्कार, मुश्किलों का पहाड़व्यवस्था का फ़रेब और बहते मकानदर्शन में अजब-गजब राजनीतिक विज्ञानक्या कहूँ?वो ख़ूबसूरत बरसात इसबार नहीं दिखती।।
क्या कहूँ?वो पहले वाली बात इसबार नहीं लगती,
कहीं उदासी, कहीं भय तो कहीं ख़ामोशीबेबस चीत्कार, मुश्किलों का पहाड़
व्यवस्था का फ़रेब और बहते मकानदर्शन में अजब-गजब राजनीतिक विज्ञान
क्या कहूँ?वो ख़ूबसूरत बरसात इसबार नहीं दिखती।।