अलमारी,दराज़,ताखा,घर का कोना-कोना तुम्हारी जरूरते सब बिखेर क्यों देती हैं हड़बड़ाहट में तुम मुझको भी उलट-पुलट जाते हो,ये क्या करते हो दिन भर घर पर क्या करती हो,तुमने मुझसे पूछा है,ये क्या करते हो।   तुम्हारे लफ्ज़ कुछ दिल पे छपे हैं और कुछ पेशानी पर,शाम को जब तुम वापस आओ अपने चुम्बन से शब्द चिह्नों को मिटाना तकल्लुफ़ की तह पर तह लगाने में तुम मुझको भूल जाते हो,ये क्या करते हो दूसरे नहीं समझते मुझको,और तुम भी बड़े हिसाबी हो,ये क्या करते हो।