सुनो प्रिये सरकार मेरे, मंदसौर में किसान नहीं मरा हमारी रोटी मरी है, हमारी दाल मरी है अपनी फसलों को जवां रखने के लिए उसने अपने अस्तित्व में कई पैबंद लगाए हैं खेतों को सींचने के लिए,न जाने उसने कितने साल चिथड़े में गुजारे हैं उसके तन से बू आती है तभी फसल महकती है सुनो प्रिये सरकार मेरे, मंदसौर में किसान नहीं मरा उसके बच्चों के सपने मरे है उसका आँगन,खेत,खलिहान मरा है जिसने एक-एक दाने के लिए अपनी देह झुलसाई है उनके घर में हमसब ने मिलकर ये कैसी आग लगाई है जब कोई किसान आत्महत्या करता है किसान नहीं मरता,भारत की पहचान मरती है सुनो प्रिये सरकार मेरे, मंदसौर में किसान नहीं मरा प्रेमचंद का होरी मरा है उसकी मरजाद मरी है धनिया का संसार मरा है आज फिर कोई गोबर दिग्भ्रमित हुआ है शौक के लिए गमलों में कैक्टस उगाने वाले क्या जाने भूख की चुभन क्या होती है सौन्दर्यप्रसाधन थोपकर घर से निकलने वालों को उसकी झुर्रियों का अंदाज़ा क्या होगा किसान और मिट्टी के याराना का किसी और को तकाज़ा क्या होगा सियासत से निकलकर उनके प्रति कृतज्ञ बनो यू अन्नख़राम न बनो सुनो प्रिये सरकार मेरे, मंदसौर में किसान नहीं मरा हमारी रोटी मरी है, हमारी दाल मरी है।