समाज के माथे पर मानों कलंक

सबको डस लेता है दहेज का दंश

बेटी जो प्यारी दुलारी हमारी

दहेज के रेश में हो रही दुखियारी

अमीर हो मां-बाप

चाहे हो गरीब के पुजारी

जुटाना पड़ता है सबको बिटिया की शादी के लिए दहेज भारी।


पुत्री हमारी जो थी कुआंरी

पढ़ी लिखी है फूलकुमारी

दहेज के पीछे हुआ भाई भिखारी

नौकरों की भांति खट्टे पति के घर बेचारी

सहित है सास के ताने

कहती नहीं कुछ लोग हैं अनजाने

दहेज का बोझ देकर भेजा है मां ने।


कोई लगाई फांसी का फंदा

आत्महत्या के कारण होती है जगत में निंदा

कोई बहू को घर से निकाले

झगड़ों को कोई ना लेना चाहे अपने पाले।


आओ सब मिल कर दहेज प्रथा का बहिष्कार करें

दहेज मुक्त भारत का निर्माण करें।