रात रात में बात ही
कुछ ऐसी है चंदा की चमक
बादल की नमी
अंधेरो की महफ़िल
सन्नाटो से सजी गुज़रे वक़्त की याद
आने वाले कल के सपने वो अनजबी
जो आज है सबसे खास
और कुछ गैर जो थे
अपने कुछ दर्द जिनसे है
पलके भारी तो
वो ख़ुशी की उम्मीद जिससे धड़कने है
जारी उन यादो का डिब्बा जिन्हें खोलने का हौसला नहीं जुट पाया
तो कुछ बीती यादे जो चुभती है
आज भी इस सीने में तीस की तरह
वो तकिये पे आंसू की बौछार
वो चादर में गम को ओढ़ना
कुछ अनकहे अल्फ़ाज़
कुछ बातो को पीछे छोड़ना
सपनो के जहाँ को सजाना
तो कुछ कड़वी हक़ीक़त घोल के पी जाना
कहने को अँधेरा और अकेलापन चलते है साथ
पर ज़िन्दगी के सारे रंग सिमटते है
इन अंधेरो में इस रात में बात ही कुछ ऐसी है