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भारतीय भाषाएँ किधर जा रही हैं? - राहुल देव

OpinionOpinion October 22, 2021
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भारतीय भाषाएँ किधर जा रही हैं?

कैसे भविष्य की ओर अग्रसर हैं?

अगले २५-५०-१०० साल बाद वे किस हाल में होंगी? 

इसका जवाब कोविड की शब्दावली और सबके ताज़े अनुभव के मुहावरे में देता हूँ।  

अभी वे अंग्रेज़ी वाइरस-संक्रमण की दूसरी अवस्था में हैं।सबको कुछ-कुछ भाषिक हरारत, बदन दर्द, हल्की खाँसी जैसे लक्षण महसूस होने लगे हैं।

२५ साल बाद यानी हमारी स्वतंत्रता के १०० साल होने के समय तक ये भाषाएँ अस्पताल में पहुँच चुकी होंगी। 

५० साल में वे सघन चिकित्सा ईकाई यानी आईसीयू में होंगी।

१०० साल में वेंटीलेटर में होंगी और उन्हें कृत्रिम तरीकों से किसी तरह नाममात्र के लिए जीवित रखा जा रहा होगा। 

सारी छोटी भाषाएँ जैसे जनजातीय भाषाएँ कब की भाषा संग्रहालयों में पहुँच चुकी होंगी। उनके जीवाष्मों को कुछ सिरफिरे भाषा-प्रेमी टूटे दिलों के साथ शोध आदि करके उनकी स्मृति को जीवित रखने के प्रयास कर रहे होंगे।

वे जनपदीय भाषाएँ जिन्हें आज कई लोग गलती से बोलियाँ कहते हैं और जिनके पास बोलने वालों की विशाल संख्या होने के बावजूद प्रभावी राज्य संरक्षण और सांस्थानिक-सामाजिक समर्थन नहीं है या घट रहा है वे शायद बूढ़ों की स्मृतियों में, गीत-संगीत-साहित्य की रिकार्डिंग में कम से कम सुनी जा सकेंगी। लेकिन वे आज की तरह जीवन्त, धड़कती हुई जिंदा जुबानें नहीं होंगी।

इसके आगे के अनुमान लगाना व्यर्थ है। 

भाषाओं की उम्र मनुष्य की उम्र की तुलना में सैकड़ों-हज़ारों गुना लंबी होती है। इसलिए २०० साल से उनके भीतर घुसा हुआ अंग्रेज़ी का विषाणु धीमे-धीमे बढ़ता हुआ अब महसूस होने वाले लक्षण दिखाने लगा है। इस बीच उसने विकास के कई चरण पार किए हैं। 

चीन की वूहान प्रयोगशाला कोविड का उद्गम है कि नहीं इस पर तो अभी विवाद और संशय है लेकिन भारत तथा पश्चिमी उपनिेवेशवाद-साम्राज्यवाद के शिकार पूर्व-गुलाम देशों-समाजों में अंग्रेज़ी और दूसरी औपनिवेशिक-साम्राज्यवादी भाषाओं की तरह इस भाषा कोविड वाइरस के उद्गम के बारे में कोई शंका नहीं है। सारा संसार जानता है। 

सवाल होगा- शरीर के कोविड की तरह क्या इसका कोई टीका तब तक नहीं आ चुका होगा? क्या पूरा इलाज करके वाइरस को मार देने या पूरी तरह बेअसर  कर देने वाली दवा तब तक ईजाद न हो चुकी होगी? 

उत्तर यह है कि टीका अस्तित्व में आ चुका है। वैसे तो वह कभी भी अनुपस्थित नहीं था। लेकिन बीमारी जब ऐसी हो जो दशकों तक बिना ऊपरी लक्षणों के रह सकती हो या जिसके लक्षण तो मौजूद हों लेकिन घर वालों और चिकित्सकों को उदासीनता, असंवेदनशीलता और अज्ञान के कारण दिखें ही नहीं तो टीकों-इलाज का होना बेमानी हो जाता है। 

दूसरे, इस विषाणु के संक्रमण की विशेषता यह है कि यह संक्रमितों को भीतर से धीरे-धीरे कमज़ोर करते हुए बाहर से सुख, आनन्द और शक्ति-सामर्थ्य का ऐसा मादक नशा देता है जैसे शराब, अफीम और उसके तमाम भाईबंद। कईयों का नशा जीवन भर नहीं उतरता, गहराता जाता है। सामूहिक नशे की इसी अवस्था के लिए मुहावरा बना है कुएँ में भाँग पड़ना। भारत दशकों से इसी नशे के कुएँ का पानी पी रहा है। उसके तलबगारों की संख्या बढ़ती ही जाती है। आखिर ज्यादातर चिकित्सक भी तो उसी का पानी पी रहे हैं। 

पहले लक्षणों को समझ लेते हैं। फिर टीके और दवा की बात समझना आसान होगा। 

वह समाज की कोई परंपरा-व्यवहार हो या बाजार का कोई उत्पाद या सेवा, कोई फसल हो या कपड़ा,  किसी भी वस्तु के अस्तित्व में बने रहने और बढ़ने के लिए दो में से कम से कम कोई एक शर्त अनिवार्य है - आवश्यकता/उपयोगिता और माँग। आवश्यकता या उपयोगिता स्वयंसिद्ध बाते हैं। माँग सच्ची भी हो सकती है और विज्ञापन-फैशन-चलन-ग्लैमर जैसे मनोवैज्ञानिक तत्वों से पैदा की हुई हो सकती है। समूचा विज्ञापन और मार्केटिंग उद्योग ज़रूरी या गैर-ज़रूरी चीज़ों को आकर्षक और वांछनीय बना कर बेचने की रणनीतियों पर ही चलता है।  यह सिद्धाँत भाषाओं पर भी लागू होता है। 

आज भारत में किन भाषाओं की माँग है? कितनी है? कौन सी ऐसी भाषा/भाषाएँ हैं जिन्हें आज का भारत माँग रहा है? 

किस भाषा की कितनी माँग है और कहाँ है यह विज्ञापनों से काफ़ी सहजता से दिख जाता है। देश के लगभग हर कस्बे में आज अंग्रेज़ी सिखाने- ‘स्पीकने’ की दूकानें या विज्ञापन मिल जाते हैं। हर भाषाई अखबार में इन संस्थानों के विज्ञापन छपते हैं? क्या हम कहीं भी कोई भारतीय भाषा सिखाने के संस्थान, विज्ञापन पाते हैं? उत्तर हम सब जानते हैं। भारत के भाषा बाज़ार में एक ही भाषा की माँग है- अंग्रेज़ी की।

देश का ग़रीब से ग़रीब अभिभावक यह समझ गया है कि उसके बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए और कुछ हो न हो अंग्रेज़ी बिलकुल अनिवार्य है। इस देश-व्यापी विराट माँग का सीधा असर प्राथमिक शिक्षा के ताज़ा आँकड़ों और कई राज्य सरकारों के निर्णयों पर दिख रहा है। प्रत्येक राज्य के आँकड़े बता रहे हैं कि सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में प्रवेश दर लगातार गिर रही है। विद्यालय हैं, इमारतें, बुनियादी सुविधाएँ हैं, शिक्षक हैं, शुल्क नगण्य है, पाठ्यपुस्तकें, शिक्षा सामग्री मुफ्त हैं लेकिन ग़रीब अभिभावक भी बच्चों को उनमें नहीं भेज रहे। बाकी सारे खर्चों में कटौती करके कई लाख ऐसे मान्यता-प्राप्त या मान्यता-हीन निजी विद्यालयों में ऊँचे शुल्क देकर बच्चों को भेज रहे हैं जिनके बोर्ड में अंग्रेज़ी-माध्यम लिखा होता है और प्रबंधन-शिक्षक उन्हें अपनी अंग्रज़ी माध्यम शिक्षा के बारे में प्रभावित कर लेते हैं। 

राज्य सरकारें मजबूर होकर या तो भाषा-माध्यम विद्यालय बंद कर रही हैं या उन्हें अंग्रेज़ी-माध्यम में बदल कर छात्रों को आकर्षित करने की कोशिश कर रही हैं। प्राथमिक शिक्षा के सबसे ताज़ा आँकड़े आज की स्थिति और भविष्य के रुझानों को साफ दिखाते हैं। ये आँकड़े शिक्षा मंत्रालय के तहत ‘एकीकृत जिला शिक्षा सूचना तंत्र' (यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफर्मेशन सिस्टम फॉर एजूकेशन) से प्रति वर्ष इकट्ठा किए जाते हैं। 

वर्ष २०१९-२०२० के आँकड़े ये हैं। 

देश के एक चौथाई से अधिक छात्र अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ रहे हैं- २६%। सबसे बड़ा माध्यम अब भी हिंदी है, ४२ % लेकिन सबसे तेज़ी से बढ़ती हुई माध्यम भाषा अंग्रेज़ी है। वर्ष २००३ से २०११ के आठ सालों में अंग्रेज़ी माध्यम में २७४% की वृद्धि हुई। हिंदी अकेली भाषा थी सभी भारतीय भाषाओं में जिसमें वार्षिक वृद्धि दर २००८-२०१३ के बीच २५% थी। इन्हीं पाँच सालों में अंग्रज़ी माध्यम की वृद्धि दर हिंदी की दोगुनी थी। बाकी सारी भाषाओं में प्राथमिक शिक्षा में प्रवेश दर में लगातार कमी आ रही थी। 

उत्तर के तीन राज्यों- हरियाणा, पंजाब और दिल्ली में अब अंग्रेज़ी माध्यम छात्र ५० % से अधिक हो गए हैं। दिल्ली में यह प्रतिशत ६० है। सबसे ऊँची छलांग लगाई है हरियाणा ने जहाँ पाँच साल में यह प्रतिशत २७.५% बढ़ कर ५० से ऊपर हो गया है। पंजाब, हिमाचल और उत्तराखंड में भी यह प्रतिशल लगातार बढ़ रहा है।  

दक्षिण के पाँच में से चार- आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल में अंग्रेज़ी माध्यम का प्रतिशत आधे से कहीँ अधिक है। तेलंगाना में यह ७३.८% है, आंध्र प्रदेश लगभग ७०%, तमिलनाडु में ५७.६% और केरल में ६५%। केवल कर्नाटक ऐसा दक्षिणी राज्य है जहाँ कन्नड़ माध्यम में अब भी ५३.५% छात्र बचे हैं हालाँकि वहाँ भी उनमें तेज़ी से कमी आ रही है।

सबसे कम अंग्रेज़ी माध्यम वाले प्रदेश हैं-  प.  बंगाल (५.३%), ओडिशा (९.५%), महाराष्ट्र (५.६% ) और बिहार (१०% )। सबसे बड़े हिंदी राज्य उत्तर प्रदेश के आँकड़े अभी उपलब्ध नहीं हैं। 

संकेत साफ हैं। यह २०२० तक की स्थिति है। अगले १०-१५ और २० सालों में अंग्रेज़ी माध्यम का प्रतिशत और वृद्धि दर और तेज़ी से बढ़ने ही वाली है। इसलिए मान सकते हैं कि स्वतंत्रता की शताब्दी मनाते भारत में उसके कम से कम ९५% बच्चे अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ रहे होंगे।

अनुभवी और वरिष्ठ शिक्षाविद बताते हैं कि बड़े शहरों के बड़े निजी विद्यालयों को छोड़ कर अधिकतर अंग्रेज़ी माध्यम विद्यालयों के साथ ‘तथाकथित’ लगा लेना चाहिए। क्योंकि सच्

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