1980 के दशक के शुरूआती दौर की बात है। कोटा शहर तब तक देश भर में अपने औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लिये जाना जाता था और अक्सर इसे राजस्थान की औद्योगिक राजधानी भी कह दिया जाता था। लेकिन 1980 के दशक के शुरूआती दिन कोटा के औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लिये काली छाया लेकर आये। एक एक करके कोटा के छोटे बड़े कारखाने बंद होने लगे। बंद हुए कारखानों की छंटनी के कारण लोगों के सामने न केवल रोजगार का संकट खड़ा हो गया बल्कि शहर की आर्थिक गतिविधियों की निरंतरता भी सवालों के घेरे में आ गई। ऐसे में कुछ लोगों की प्रतिभा और मेहनत के फलस्वरूप पनपी कोचिंग ने कोटा की आर्थिक गतिविधियों को संबल दिया और देखते ही देखते एक छोटा मोटा व्यवसाय समझी जाने वाली कोचिंग कोटा की प्रमुख ‘इण्डस्ट््री’ बन गई। हालत यह है कि आज देश भर में कोटा को ‘कोचिंग सिटी’ के रूप में जाना जाता है। कोटा की चरपरी कचैरी, मनमोहक कोटा डोरिया साड़ी और चमकीले-मजबूत कोटा स्टोन के बाद कोचिंग की शानदार सफलता भी कोटा की व्यापक पहचान का कारण बन गई है। इन दिनों कोटा के सांसद ओम बिरला लोकसभा अध्यक्ष हैं और उनका संसदीय क्षेत्र होने के कारण भी कोटा मीडिया की नज़रों में बना रहता है।

प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच अपने लिये गौरव और गरिमा जुटाना शायद कोटा की प्रवृत्ति का हिस्सा है। तभी तो यहाँ का एक जांबाज सपूत अजय आहूजा, कारगिल की पहाड़ियों पर पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में पहला शहीद होकर इतिहास के पृष्ठों में अपनेआप को अमर कर गया। सन् 1857 की क्रांति के समय जब सारा देश दीवाली के पूर्व धनतेरस का त्यौहार मना रहा था, कोटा के राष्ट््रभक्त लाड़ले विदेशी फौजों से लोहा ले रहे थे। सन् 1942 में तो यहाँ स्वतंत्रता सैनानियों ने कोतवाली पर अपना कब्जा ही कर लिया था। जब गोवा की आजादी की लड़ाइ्र का मौका आया तो कोटा से गये स्वतंत्रता सैनानियों ने पुर्तगाली फौजों को छक्के छुड़ा दिये और कोटा जिले के छोटे से शहर रामगंजमण्डी के सपूत पन्नालाल ने अपने प्राणों की आहुति देकर भी गोवा की धरती पर तिरंगा लहरा दिया। जी हाँ, वही रामगंजमण्डी शहर जिसके आसपास की खदानों में निकला मजबूत चमकीला पत्थर ‘कोटा स्टोन’ के रूप में दुनिया भर में अपनी खास पहचान रखता है।

विपरीत परिस्थितियों से गुज़रते हुए अपने संकल्पों को साधना कोटावासियों को आकर्षित करता है। शायद इसलिये, क्योंकि कोटा शहर उस चंबल नदी के किनारे बसा है- जिस चंबल नदी का प्रवाह दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर है। आमतौर पर नदियाँ उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर बहती हैं- लेकिन चंबल नदी देश की उन विलक्षण नदियों में एक है जिनका प्रवाह विपरीत दिशा में है। शायद इसीलिये चंबल नदी आधुनिक विकास और बीहड़ के दुर्दान्त जीवन का साक्ष्य एक साथ देती है। कोटा के जाने माने कवि जगदीश सोलंकी तो अपनी एक प्रसिद्ध रचना में यहाँ तक कहते हैं कि -‘‘घेरदार रास्ते, घुमावदार मोड़/ पानी पीछे पीना तू पहले तो गोली छोड़/ मौत से टकराना इसकी शर्त पुरानी है/ सोच‘ समझ कर पीना- यह चंबल का पानी है।"

कोटा शहर शायद देश का ऐसा अकेला शहर है जिसके आसपास परमाणु, कोयले, पानी और गैस- सभी से बिजली बनाने के संयंत्र स्थापित हैं।इस शहर के निकट ही मुकुंदरा बाघ अभ्यारण्य है तो दूसरी ओर सरकार ने हाल ही में बूँदी जिले के रामगढ़ क्षेत्र को भी अीायारण्य घोषित करने की अधिसूचना जारी कर दी है। रामगढ़ विषधारी नामक यह अभयारण्य प्रसिद्ध रणथंभौर अभयारण्य और मुकंुदरा अभयारण्य को जोड़ने का काम भी करेगा|

दुर्दान्त समझी जाने वाली चंबल को अपने लिये विकास की भागीरथी बना लेने वाले इलाके के लोगों का ही यह तेवर हो सकता है कि जिस विभीषण को कहीं नहीं पूजा जाता, उस विभीषण को कोटा के पास कैथून शहर में ‘विभीषण जी महाराज’ कहकर पूजा जाता है। परंपराऐ ंतो रावण जैसे बदनाम मिथकीय चरित्र को भी दशहरे पर रावणवध के पहले ‘रावण जी’ कहकर साष्टांग दण्डवत् करने की रही है। मान्यता है कि दशहरे पर रावण को दण्डवत् करने और रावण के पुतले पर कंकड़ फैंकने से साल भर तक बीमारियाँ और दुर्भाग्य व्यक्ति को नहीं घेरते। दशहरे के अवसर पर कोटा में लगने वाले मेले को देश के इस हिस्से की सबसे प्रमुख व्यापारिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में एक माना जाता है। मान्यताओं की ही बात करें तो हर साल कोटा जिले के एक कस्बाई शहर अटरू में रामनवमी पर होने वाले धनुष यज्ञ से जुड़ी मान्यताऐं भी कम रोचक नहीं हैं। रामविवाह से जुड़ी इस लोकलीला के बारे में माना जाता है कि जब परशुराम बने पात्र को एक विशिष्ट आईना दिखाया जाता है तो उसका अपने पर नियंत्रण नहीं होता और मानो स्वयं परशुराम का आक्रोश उसमें प्रविष्ठ हो जाता है। यह पात्र अपनी भूमिका के निर्वहन के लिये रात भर में विभिन्न मंचों के बीच जितना दौड़ता है, उतनी दौड़ यदि कोई व्यक्ति एक सीधी रेखा में लगाये तो शायद कोटा से बूँदी पहुँच जाये। धनुष लीला शायद दुनिया की ऐसी अकेली मंचीय प्रस्तुति है जिसमें एक साथ चार विभिन्न मंचों का प्रयोग होता है और मंचों के बीच दौड़ दौड़ कर अपने संवाद बोलते हुए परशुराम इसे ‘स्ट््रीट प्ले’ नामक विधा से भी जोड़ देते हैं। हर साल सांगोद में नहान के अवसर पर प्रदर्शित की जाने वाली जादुई लागें भी देखने वालों को किसी चमत्कार से कम नहीं लगतीं। जब सूत के एक पहले से धागे से बांधकर बैलगाड़ी का भारी पहिया बीच सड़क पर किसी रस्सी से लटका दिया जाये तो देखने वाला अपनी आँखों पर भरोसा कैसे करे? माना जाता है कि प्राचीन काल में बंगाल के काले जादू की ही तरह सांगोद की ‘जानतेरी’ की भी बड़ी धाक थी- जानतेरी याने दिव्य शक्तियों के सहारे अप्रतिम कामों को कर देने की सामथ्र्य।

प्रेम भी किसी जानतेरी से कम नहीं होता और माना जाता है कि दुष्यंत शकुंतला का ऐतिहासिक मिलन कोटा के ही कंसुआ नामक स्थान पर हुआ था। यहाँ बने प्राचीन शिवमंदिर के बारे में कहा जाता है कि कभी यहीं पर महर्षि कण्व का आश्रम था। दरा के निकट स्थित भीमचैरी के बारे में माना जाता है कि पाण्डुपुत्र भीम ने एक यक्षिणी के प्रेम में पड़ने के बाद उसकी शर्त को पूरा करने के लिये एक रात में इसका निर्माण किया था। इसी भीमचैरी के निकट वह भव्य महल है जो महाराव मुकुन्द सिंह ने अपनी प्रेयसी अबली मीणी की इस शर्त पर बनवाया था कि उसके महल के झरोखे से उसे अपने गाँव की झलक दिखनी चाहिये। उन्हीं के नाम पर इस स्थान से गुज़रती पहाड़ियों को मुकुन्दरा रेंज कहा गया। आज दरा एक राष्ट््रीय अभयारण्य क्षेत्र का हिस्सा है|

मन का अभयारण्य धरती के अरण्यों से प्रभावित होकर किसी तरह सृजन को सौंदर्य में परिवर्तित करता है, किसी को यह जानना हो तो कोटा शैली के भित्तीचित्रों को देखे। कोटा की चित्रशैली हालाँकि बूँदी की विश्व प्रसिद्ध शैली की ही उपशैली मानी जाती है, लेकिन फिर भी कला की दुनिया में इसकी पहचान है। कोटा के ही चट्टानेश्वर नामक स्थान पर प्रागैतिहासिक मानव द्वारा बनाये गये शैल चित्र बताते हैं कि मानव सभ्यता के शुरूआती दौर से ही यहाँ जीवन में सौंदर्य और सृजन की आकांक्षाऐं अभिव्यक्त होती रही हैं। प्रागैतिहासिक मानव द्वारा बनाये गये शैलचित्रों से लेकर छत्रविलास तालाब के किनारे बनवाई गई दुनिया के आश्चर्यों की प्रतिकृतियों तक कोटा अपने आप में ऐसा बहुत कुछ समेटे हुए है जो मनुष्य को एक शायर के इन शब्दों से अभिप्रेरित करता है -‘‘ उसूलों पे जहाँ आँच आए, टकराना ज़रूरी है/ जो ज़िन्दा हैं तोैं तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है।’’


- अतुल कनक

अतुल कनक राजस्थानी भाषा के विख्यात साहित्यकार हैं। इनके द्वारा रचित एक उपन्यास जूण–जातरा के लिये उन्हें सन् 2011 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

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