बात नवंबर 1983 के पहले सप्ताह की है। उन दिनों तक एक किशोर कवि के रूप में मैं हिन्दी कविसम्मेलनों में काव्यपाठ हेतु जाने लगा था और मेरी ओज मिश्रित व्यंग्य रचनाओं को श्रोता चाव से सुनते भी थे, सराहते भी थे। उन्हीं दिनों क्रिकेट कमेंट्री की तर्ज पर मैनें देश की राजनीतिक परिस्थितियों पर एक व्यंग्य मंचों पर पढ़ना शुरू किया- जिसे बहुत लोकप्रियता मिली। बाद में देश के कुछ व्यस्त कवियों ने उसकी नकल भी की। कुछ ईमानदारी पूर्वक बताते रहे कि उन्होंने इसकी प्रेरणा मेरी रचना से ही ली, कुछ यह मानकर कि बाजार में आ गया आइडिया किसी के बाप का नहीं होता- अपनी मौलिक सूझ कह कर तालियाँ बटोरते रहे। हिन्दी कविसम्मेलनों के साथ ऐसा आज भी होता है। कोई आइडिया तालियाँ लूट ले तो फिर तालियों में हिस्सेदारी के लिये बहुत सारी प्रतिभाऐं उस आइडिये पर टूट पड़ती हैं। अस्तु।
मैं उन दिनों उस उम्र में था, जिसे मसें भीगने की उम्र कहते हैं। कमसिनी थी जी। इस उम्र में आदमी को थोड़ी सी तालियाँ, थोड़ा पैसा और थोड़ा यश मिलने लगे तो उसके पाँव जमीन पर नहीं पड़ते। मैं भी जीवन के उसी दौर से गुज़र रहा था। हालत यह थी कि जब इंजीनियरिंग के लिये प्रवेश परीक्षा देने की नौबत आई तो यह कहकर मुजफ्फरनगर और मेरठ के कविसम्मेलनों के लिये रवाना हो गया कि कविसम्मेलन जो पैसा देते हैं, उतना पैसा बँधी बँधाई तनख्वाह में नहीं मिलता। हालाँकि उन दिनों मैं बहुत तीस-मार खाँ नहीं हो गया था, लेकिन आप अपने आप को तुर्रमखाँ समझ कर अपने ही पाँव पर कुल्हाड़ी मारने पर आमादा हो तो आपको कोई कब तक रोक सकता है? माता-पिता तो बेचारे पाँच बच्चों के परिवार को पालने के लिये अपने जीवन का कुरूक्षेत्र लड़ रहे थे, वो मेरे जैसे उद्दंडी को कब तक समझा पाते। चार बहिनों के बाद जन्मा था मैं और समचुच बहुत उद्दण्ड था। हाँ, माँ ने इतना सा जरूर कहा था - सभी बाई बहिनों को अपने आसपास बैठाकर, ‘एक तपस्या की तरह जी है जिन्दगी। बुढ़ापे में इसे शर्मिन्दा मत होने देना।’
राजस्थान, मध्यप्रदेश और सीमावर्ती उत्तरप्रदेश के कई शहरों में काव्यपाठ करने के बाद इस घटना वाले समय तक मैं अपनेआप को अखिल भारतीय कवि समझने में क्यों संकोच करता? आज भी मंच पर और मंचेतर साहित्य जगत् में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो समझते हैं कि वो ही सर्वज्ञ हैं और वो तमगा टाँगेंगे तो ही किसी की प्रतिभा धन्य होगी। ...तो अपनी ही पाली हुई कई किस्म की गलतफहमियों के साथ उस दिन मैं हिन्दी कविमंचों के सबसे लोकप्रिय कवियों में एक जगदीश सोलंकी के यहाँ गया। चूँकि जगदीश सोलंकी कविसम्मेलनों का एक बड़ा नाम हैं, इसलिये मैं उनसे मिलते समय अपने आचरण की अकड़ को थोड़ा पानी में भिगोकर नरम कर लिया करता था। आपने भी देखे होंगे ऐसे जीव े, जो यों तो बहुत तीस मार खाँ बनते हैं लेकिन किसी संपादक को देखकर, किसी प्रकाशक को देखकर, किसी बड़े लेखक को देखकर भौंकना भूल जाते हैं और अपनी दुम हिलाने लगते हैं। जगदीश सोलंकी उम्र में मुझ से बड़े हैं और उन्होंने मुझे शुरू से ही बहुत अपनत्व दिया है और मैं अपनी तमाम उद्दण्डताओं के बावजूद इतना उच्छ्ृंखल नहीं हुआ कभी कि अपनत्व देने वाले की शान में गुस्ताखी करूँ।
शुरूआती नवंबर की उस दोपहर मैं अपनी साइकिल से जगदीश सोलंकी के घर पहुँचा। उन्होंने प्रेम से बैठाया। बातें की। बातों ही बातों में मैनें कहा -‘‘अंकल (हाँ, मैं उन्हें अंकल ही कहता हूँ)- अपनी पसंद के सब कवियों रचनाकारों के साथ मंच पर कविता पढ़ ली है। बस ऐक शरद जोशी के साथ पढ़ने की इच्छा है।’’ जगदीश सोलंकी ने आश्चर्य से पूछा -‘‘अभी तक कहीं शरद जोशी के साथ कविता नहीं पढ़ी?’’ मैनें कहा -‘‘नहीं। बस चकल्लस की कैसेटों के माध्यम से उन्हें सुना ही है।’’ जगदीश सोलंकी ने मुझे विश्वास बँधाया- तेरी इच्छा है तो जल्दी ही पूरी भी होगी। कुछ देर बतियाकर मैं अपने घर के लिये रवाना हो गया। घर पहुँचा तो मेज पर डाक में एक लिफाफा भी मिला। ऊपर नागदा के जगन्नाथ विश्व का हस्तलेख था। बड़े बड़े अक्षरों के कारण उनका हस्तलेख अलग से पहचान में आ जाता है। मैनें लिफाफा खोला। अंदर एक पत्र था जिस पर लिखा था -‘प्रिय अतुल 18 नवंबर को नागदा में एक कार्यक्रम रखा है। तुम्हें आना है। चूँकि आयोजन में तुम और शरदजोशी ही होंगे, इसलिये समय पर पहुँच जाना।’’
उलटे पैरों दौड़ा ’रीचिंग’ का टेलीग्राम करने। उस वक्त तक मोबाइल चलन में क्या कल्पना में भी नहीं आये थे और टेलीफोन सुविधाऐं भी सीमित ही थीं। समाचार या संवाद संप्रेषण का सबसे तेज माध्यम टेलीग्राम ही हुआ करता था। क्या अजब बात है कि जो टेलीग्राम उस दौर में त्वरित समाचार प्रेषण का सबसे ताकतवर माध्यम था, वही टेलीग्राम अब प्रचलन के बाहर हो गया है। जिन्हें यह गलतफहमी है कि वो आज बहुत ताकतवर हैं, उन्हें क्या टेलीग्राम के उदाहरण से कुछ नहीं सीखना चाहिये?
जैन आगम में एक कहानी है। राजा भरत चक्रवर्ती होने के बाद मेरू पर्वत पर अपना नाम लिखने गये। परंपरा थी कि चक्रवर्ती को उस पर्वत पर अपना नाम लिखना होता था। भरत बहुत धूमधाम के साथ इस अनुष्ठान को संपन्न करने के लिये रवाना हुए। सोचा था कि वो पहले चक्रवर्ती हैं और इसलिये मेरू पर्वत पर उनका नाम लिखा जाना इतिहास की एक अतिविशिष्ट घटना होगी। लेकिन भरत जब वहाँ पहुँचे तो उन्होंने देखा कि पूरा पर्वत असंख्य नामों से भरा पड़ा है। भरत को अपना नाम लिखने की जगह नहीं मिली। मजबूरन किसी और का नाम मिटाकर उनका नाम लिखने की व्यवस्था करनी पड़ी। लोग ऐसी जीत के लिये षड्यंत्रों और जोड़- तोड़ को साध रहे हैं, जो विजय न तो अंतिम है और न ही शास्वत। साहित्य की दुनिया में तो ऐसे जुगाड़ों का तूफान सा आया पड़ा है। कोई यह नहीं समझना चाहता कि ‘मुझ से पहले कितने शायर आये और आकर चले गये।’ हालत यह है कि कुंए के मेंढकों ने अपने अपने समूह बना रखे हैं और गलती से कोई समुद्र का मेंढक उधर आ निकले तो अकड़ कर पूछते हैं -‘‘बता तेरा समुद्र क्या हमारे कुँए से बड़ा है?’ खैर।
नागदा के कार्यक्रम का निमंत्रण मेरे लिये मुँह माँगी मुराद पूरी होने जैसा था। इसी उत्साह में मैनें जगन्नाथ विश्व से अपना पारिश्रमिक तय नहीं किया और सीधे स्वीकृति दे दी। आप यदि बाजार में सेवाओं के बदले पारिश्रमिक लेते हैं (भले ही वो कविसम्मेलन में काव्यपाठ ही क्यों नहीं हो) तो किसी आयोजक पर इतना भरोसा उचित नहीं होता। उस कविसम्मेलन में मिला पारिश्रमिक मेरी कमसिनी के बावजूद इतना कम था कि मैनें उसके बाद तय किया कि मैं बिना पारिश्रमिक तय किये बिना कभी कविसम्मेलनों में नहीं जाऊँगा। हालाँकि बाद में भी मैं अपने इस निश्चय पर कायम नहीं रह सका। आप पूछ सकते हो कि जब 17 साल की उम्र में कविसम्मेलनों के प्रति मेरे मन में इतनी आसक्ति थी तो फिर अब मुझे कविसम्मेलनों से विरक्ति सी क्यों है? यह बात भी लिखने की हिम्मत करूँगा कभी- और लिख पाया तो न जाने कितने चेहरों से नकाब हटेंगे। लेकिन शरद जोशी का स्मरण मेरे लिये बहुत ही पुनीत अनुष्ठान है और मैं इसके बीच किसी घिनौनी हरकत को याद नहीं करना चाहता।
18 नवंबर 1983 की सुबह मैं अपने शहर से देहरादून एक्सप्रेस नामक गाड़ी में बैठा और दोपहर में नागदा पहुँच गया। तय था कि आयोजकों की गाड़ी लेने के लिये स्टेशन तक आएगी। जगन्नाथ विश्व स्वयं ही प्लेटफार्म पर मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। अपना ब्रीफकेस हाथ में लेकर मैं उनके साथ स्टेशन के बाहर आया। बिड़लाग्राम के रेस्टहाउस में जाना था। बाहर एक सफेद एम्बेसेडर कार खड़ी थी। मेरा ब्रीफकेस डिक्की में रखवाकर, जिसमें एक अटैची पहले से रखी थी, जगन्नाथ विश्व कार में आगे बैठ गये और मुझे पिछली सीट पर बैठा दिया। पिछली सीट पर ही दूसरी ओर एक अधेड़ सा आदमी, आँखों पर चश्मा लगाये अजीब से अंदाज में सिकुड़ा हुआ बैठा था। मैनें सोचा शायद विश्व जी किसी सहायक को साथ नाये हैं। मैनें उसकी तरफ उचटती सी निगाह डाली। फिर कार की सीट के पिछले हिस्से पर अपना एक हाथ फैलाया। एक पाँव पर दूसरा पाँव चढ़ाया और ठसके के साथ बोला -‘‘चलो।’’ साथ वाला आदमी तब तक भी कुछ नहीं बोला। रास्ते में मैनें जगन्नाथ विश्व से पूछा -‘‘शरद दा अभी पहुँचे या नहीं?’’ जगन्नाथ विश्व ने मुझे अजीब सी निगाहों से देखा। फिर पूछा -‘ तुम कभी शरद जी से मिले हो या नहीं?’ मैनें सहजता से कहा -‘‘मैनें तो अपनी चिट्ठी में ही लिखा था कि आपके कार्यक्रम का निमंत्रण मेरे लिये एक वरदान की तरह है क्योंकि शरद जोशी के साथ कविता पढ़ने की मेरी इच्छा पूरी हो रही है। आज मैं उनसे पहली बार मिलूँगा।’’
जगन्नाथ विश्व तब चलती गाड़ी में पीछे की तरफ मुडे़ और हँसते हुए बोले -‘‘तुम्हारे पास शरद जोशी ही बैठे हैं।’’ अब मेरी हालत देखने लायक थी। जिसे मैं एक सहायक समझ रहा था, वह हमारे समय के सबसे बड़े व्यंग्यकारों में एक था और इतनी देर से मेरी बक-बक बरदाश्त भी किये जा रहा था। मुझे काटो तो खून नहीं। मैं इसके अलावा और क्या कर सकता था कि उनके चरणों में झुक जाऊँ? शरद जी ने स्नेह पूर्वक कहा - बहुत सुन रखा है तुम्हारे बारे में मित्रों से। आज सुन कर देखूँगा कि किसने कितना सच कहा है।’’
गेस्ट हाउस पहुँचकर दोनों अपने अपने कमरे में चले गये। कुछ देर बाद शरद जी ने मुझे अपने कमरे में बुलवा लिया और अपने खास अंदाज में कहा -‘बरखुरदार, यदि अपने बुजुर्गों के साथ बैठने में और उनसे बतियाने में कोई आपत्ति नहीं हो तो थोड़ी देर हमसे भी बतियाओ।’ इस आत्मीय वार्तालाप में उन्होंने केवल मुझसे परिवार, पढ़ाई, जीवन के लक्ष्य, प्रेरणा के बारे में पूछा। न कोई उपदेश दिया, न कोई ज्ञान बघारा। रात को दोनों मंच पर थे। मेरी भूमिका तो यही थी कि उनके आने के पहले उनके अनुकूल माहौल तैयार करूँ। उस दिन शरद दा को जी भरकर सुना। अगली सुबह भी हम दोनों साथ साथ ही स्टेशन पहुँचे। पहले उनकी गाड़ी थी। उन्होंने गाड़ी में बैठते हुए इतना ही कहा -‘गौर से देख लो मुझे। अगली बार याद रखना कि मैं ही शरदजोशी हूँ।’ मैं खिसिया कर हँस भर दिया। उनकी गाड़ी रवाना हो गई तो मैं इस पुलक से भर गया कि मैनें शरद जोशी के साथ जी भरकर बातें की हैं। कई व्यंग्यकारों को इन वर्षों में मैनें नजदीकी से देखा है। व्यंग्य के नाम पर वो जल्दी ही भौण्डेपन पर उतर आते हैं। शरद जोशी के साथ इतनी देर तक बातें करते हुए कहीं इस पीड़ा ने नहीं सताया कि क्या व्यंग्य के नाम पर इतना गलीच भी हुआ जा सकता है?
एक अच्छे आदमी का सानिंध्य आपको बहुत ही पवित्र उल्लास से भर देता है। मेरे साथ वही हुआ। अपने शहर कोटा लौटकर मैनें मित्रों को इस कार्यक्रम के बारे में बताया। कोटा के प्रसिद्ध कवि और संस्कृतिकर्मी प्रेमजी प्रेम (हाँ वही, जिन्हें बाद में उनके राजस्थानी कविता संग्रह के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला और संयोग देखिये कि सन् 2011 के लिये यह पुरस्कार मुझे भी मेरे राजस्थानी उपन्यास के लिये दिया गया) के यह आइडिया इतना पसंद आया कि उन्होंने आनन फानन में ऐसा एक कार्यक्रम कोटा में भी करने की योजना बना ली जिसमें केवल मुझे और शरद जोशी को ही काव्यपाठ करना था। उन्होंने शरद दा को पत्र लिखा। शरद दा ने अपनी स्वीकृति तो दी ही, अपने पत्र में मेरी प्रशंसा भी की। यह उनका बड़प्पन ही तो था वरना इस दौर में तो बड़े लोगों को सिर्फ उनकी ही सराहना करना अच्छा लगता है जो सार्वजनिक तौर पर उनके बड़प्पन की फड़ बाँचने को हमेशा प्रस्तुत रहते हों। 14 जनवरी 1984 को कोटा के सूचना केन्द्र में एक बार फिर एक कार्यक्रम हुआ जिसमें मैं और शरद जोशी ही प्रतिभागी रहे। इसके बाद देश के कई ऐसे शहरों में ऐसे ही आयोजन हुए। शरद जोशी के प्रेम का भाजन बनकर मैं खुद को धन्य मानता रहा। लगभग उन्हीं दिनों मैनें एक व्यंग्य लेख लिखा -‘‘मैं, शरद जोशी और कविसम्मेलन।’’ इस व्यंग्य को उस समय की लोकप्रिय पत्रिका साप्ताहिक हिन्दुस्तान ने छापा। लेख का लब्बोलुआब यही था कि किस तरह शरद जोशी की मेरे प्रति आत्मीयता के कारण आयोजक इस लालच में मुझे कविसम्मेलन में बुला रहे हैं कि मैं शरद जोशी को भी उनके आयोजन में बुलवा दूँगा और इस तरह केसे कविसम्मेलनों की मेरी ‘दुकानदारी’ ठीक मुनाफा कमाने लगी हे। साप्ताहिक हिन्दुस्तान में इस लेख के छपने के कुछ समय बाद शरद जोशी मुझे इंदौर में मिले। उन्होंने पीठ ठोंकते हुए कहा -‘‘ मैं दुनिया पर व्यंग्य लिखता हूँ। तुमने मुझे ही व्यंग्य का विषय बना दिया?’ मैनें गौर से देखा। उनके शब्दों में उलाहना नहीं था, सराहना थी। मैं उनके व्यंग्य का शिकार होने से बच गया था।
जीवन में उसके बाद अनेक रोमांचक क्षण आये। लेकिन 18 नवंबर 1983 को नागदा में उस सफेद अम्बेसेडर कार में शरद जोशी से मिलना शायद मैं कभी नहीं भूल पाऊँ।
- अतुल कनक
अतुल कनक राजस्थानी भाषा के विख्यात साहित्यकार हैं। इनके द्वारा रचित एक उपन्यास जूण–जातरा के लिये उन्हें सन् 2011 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
Note: The views expressed are the author's own. The opinions and facts expressed here do not reflect the views of Kavishala and Kavishala does not assume any responsibility or liability for the same.

