गौरव गाथाओं का उजड़ा शहर- गैण्डौली  :- अतुल कनक's image
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गौरव गाथाओं का उजड़ा शहर- गैण्डौली :- अतुल कनक

गैण्डोली एक छोटा सा कस्बा है और मेरे घर से करीब साठ किलोमीटर दूर स्थित है। अब अपने घर से साठ किलोमीटर दूर की यात्रा करना भी भला किसी वृतांत का विषय हो सकता है? प्रारंभ में शायद आप यही सवाल करेंगे लेकिन जब मेरे अनुभव को जानेंगे तो कदाचित आपकी भावना परिवर्तित हो जाए।


करीब पैंतीस साल पहले, जब मैंनें तेरह वर्ष के एक किशोर कवि के रूप में हिन्दी कविसम्मेलनों में काव्यपाठ शुरू किया था,उस समय दक्षिण पूर्वी राजस्थान के कवि मंचों पर मेरे शहर के कवि- गीतकार प्रेमजी प्रेम की तूती बोला करती थी। वो एक कुशल मंच संचालक थे और मधुर गीतकार भी। कुछ समय बाद मैंने और प्रेमजी प्रेम ने अपने अंचल की अचर्चित पुरा संपदाओं पर पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखने प्रारंभ किये। उन्हीं दिनों प्रेमजी प्रेम ने एक यात्रा के दौरान बताया था कि बूँदी जिले के एक छोटे से गाँव में कई महलों के खण्डहर हैं और उन खण्डहरों से लिपटी हुई गौरव गाथा इतिहास के भाल पर केसर तिलक की तरह है। मैंने आग्रह किया कि वो अगली बार जब गैण्डोली जाऐं, तब मुझे भी साथ ले लें। बात आई गई हो गई। कुछ समय बाद ही प्रेमजी प्रेम वहाँ चले गये जहाँ से लौटकर कोई नहीं आता। लेकिन गैण्डोली की कथा का कौतुहल मेरे मन में बना रहा।


सन् 2012 के आसपास मैंने बिटिया से वादा किया कि मैं उसे अपने अंचल की पुरा संपदा दिखाऊँगा। दरअसल, उसे शिकायत थी कि मैं उसे अपने साथ कहीं लंबी यात्रा पर नहीं ले जाता जबकि उसकी सहेलियाँ उस वर्ष की गर्मी की छुट्टियों में दूरदराज के किले -महल देख कर आई हैं। बिटिया की उम्र उस समय साढ़े दस साल थी और अपने वादे के मुताबिक मैंने उसे अपने अंचल में और आसपास स्थित शेरगढ़, तारागढ़, गागरौन, भैंसरोडगढ़, चित्तौड़गढ़, इंद्रगढ़ जैसे दुर्ग, कई पुरास्थल, मंदिर आदि दिखाए। हर जगह की अपनी खूबसूरती, हर जगह का अपना भव्य इतिहास। शुरू में हम तीन परिवार अपनी अपनी गाड़ियों से जाते थे और इस तरह एक दर्जन से अधिक व्यक्तियों का समूह साथ होता था लेकिन इस बार अर्थात् 2017 की गर्मी की छुट्टियों में ऐसा कुछ हुआ कि सबका एक साथ जाने का संयोग ही नहीं बन सका। हालांकि गर्मी की ये छुट्टियाँ बिटिया अपने नाना-नानी और मम्मी के साथ अपनी मौसी के यहाँ इंदौर बिता कर आई थी- लेकिन एक बेटी को अपने पिता के साथ भ्रमण में जो सुख मिलता है,उसे तो केवल महसूस किया जा सकता है। बिटियाऐं अपने पति में अपने पिता के स्वभाव के बिम्ब क्यों तलाशती हैं यदि इस सत्य को अनुभूत किया जाए तो ही इस बात को समझा जा सकता है कि किसी भी बेटी को अपने पिता के सान्निध्य में क्या सुख मिलता है।


बिटिया मेरी अकेली संतान है। मैं समझता हूँ कि इस उम्र में उमंगों और विचारों को बाँटने के लिये घर पर भी एक साथी की आवश्यकता होती है। कोशिश करता हूँ कि घर पर उसका साथी बन कर रह सकूँ। सावन का महीना आधा बीत चुका था। उस दिन हरियाली अमावस्या थी लेकिन बादलों ने मेरे शहर पर खुलकर करसना शुरू नहीं किया था। अलबत्ता उस दिन आसमान पर बादल अवश्य थे। मौसम घूमने लायक था। बिटिया ने अपनी इच्छा जताई और मैंने भी हाँ भर ली। लेकिन समूह के अन्य सदस्यों के अपने अपने तयशुदा कार्यक्रम थे। अंत में मैंने तय किया कि किसी के साथ के लिये रूकने या किसी को साथ देने के लिये बाध्य करने की अपेक्षा अच्छा यही होगा कि अपने हिस्से की यात्रा खुद की जाए। श्रीमती जी को बताया तो वो भी साथ जाने को तैयार हो गईं। सवाल यह था कि कहाँ चला जाए?


अचानक बरसों पुरानी सुनी हुई बातें याद आ गईं और गैण्डौली जाने का निश्चय कर लिया। इसका एक मूल कारण यह भी था कि कुछ दिनों पहले ही बड़े जियाजी के यहाँ उनके पुराने मित्र अजय भार्गव से मुलाकात हुई थी। अजय भार्गव काफी समय तक गैण्डौली में थानेदार रहे थे और कुछ समय पहले ही सेवानिवृत्त हुए हैं। उन्होंने न केवल गैण्डौली का रास्ता समझाया बल्कि गैण्डौली के बारे में कुछ अन्य रोचक बातें भी बताईं। मसलन- कैसे उन्हें बताया गया कि थाने के परिसर में कोई आहट सुनाई देती है और कैसे उन्होंने एक अमावस की पूरी रात किसी अदृश्य की आहट सुनते हुए बिताई, और वह भी तब जबकि परिसर में बिजली का प्रबंध तो था ही नहीं, केवल टॉर्च और मोमबत्ती की रोशनी का आसरा था। उन्होंने यह भी बताया कि गाँव में कुछ बहुत ही खूबसूरत बावड़ियाँ भी हैं और कुछ दूर चलकर खटकड़ नामक गाँव जाया जाए तो वहाँ भी कुछ दर्शनीय प्राचीन मठ हैं। उन्होंने ही बताया कि मेरे शहर से गैण्डौली की दूरी पैंतीस किलोमीटर है। हालाँकि जाने पर यह दूरी लगभग दुगुनी मिली।


मैं, पत्नी और बिटिया तीनों कार में बैठे और बढ़ चले गैण्डौली की ओर। पत्नी ने यह सोचकर थोड़ा नाश्ता साथ ले लिया कि भूख लगी तो काम आएगा। कापरेन तक गाड़ी अपनी गति से दौड़ी। फॉरलेन रास्ते को छोड़कर अंदर की ओर मुड़े तो चारों तरफ हरियाली हमारे स्वागत के लिये उत्सुक मिली। सिंगल लेन रास्ता था और उस पर कई खतरनाक घुमाव भी थे। बीच बीच में छोटे छोटे गाँव और आसमान पर बादल। बारिश शुरू नहीं हुई थी लेकिन बिटिया और पत्नी दोनों को ही इस छोटी यात्रा में आनंद मिल रहा था। तीन- चार जगह रूककर गैण्डौली का रास्ता पूछा तो पता चला कि कोटा से आने वाला एक और रास्ता है और तुलनात्मक दृष्टि से वह ज्यादा अच्छा है। कहने वालों ने यह क्यों कहा यह तब पता चला जब दो जगहों पर रूककर यह सोचना पड़ा कि कार को आगे कैसे ले जाया जाए। 


मुख्य मार्गों को छोड़कर जब अंदर वाले रास्तों की ओर जाया जाता है तब पता चलता है कि हमारा गणतंत्र अभी भी किन चुनौतियों का सामना कर रहा है। अभी भी गाँवों सड़कों के नाम पर संकरी पगडंडियाँ हैं, अभी भी खेत किनारे बैठे लोग स्वच्छता अभियान की धज्जियाँ उड़ाने पर आमादा हैं, हालाँकि शहरों में वाहनों की बढ़ती संख्या ने कई परेशानियाँ पैदा कर दी हैं लेकिन अभी भी गाँवों में ऐसे लोग मौजूद हैं जो कार से गुज़रते हुए परिवार को बड़े कौतुहल के साथ देखते हैं। हाँ, गाँवों में बाजार की पैठ सब तरफ है। गाँवों में हर चाय की थड़ी के बाहर एक शानदार फ्रेम में सजी हुई पानी की और शीतल पेय की बोतलें सजी हुई देखी जा सकती हैं, मोबाइल सब जगह पहुँच गये हैं, छतों पर केबल टी वी के वास्ते डिश प्लेट लगी हुई हैं। अच्छे स्कूल, डिस्पेंसरी या साफ पेयजल आपूर्ति का यथोचित प्रबंधन भले ही सब गाँवों के पास नहीं हो लेकिन मुफ्त के डेटा वाले नेटवर्क की सुविधा हो तो बहुत से ग़मों को भुलाया जा सकता है शायद! मेरे ही अंचल के लोकप्रिय जनकवि ठाड़ा ‘राही’ का एक गीत याद आ गया -‘‘हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं।’’


हालाँकि इतनी लोकतांत्रिक परिपक्वता हम लोगों में आ चुकी है कि हम ग्रामीण क्षैत्रों में घुसते समय ही विकास के दावों के दूसरे पक्ष को स्वीकार करने के लिये तैयार हो जाते हैं। इसीलिये बिटिया को जब ग्रामीण इलाके में अपने घर से दूर पानी भरने के लिये सिर पर स्टील की चरियाँ लिये हुए महिलाओं का समूह दिखा या गहरे कीचड़ में भी अपनी बेंत के सहारे मुस्कुराता हुआ बुजुर्ग दिखा तो उसके लिये ये केवल फोटो के पात्र रहे। कुछ समय पहले गाँवों की हरियाली और अपेक्षाकृत शांत जीवन देखकर यह कहने वाली बिटिया कि ‘मुझे तो आप ऐसे ही इलाके में रहने के लिये छोड़ दो’’ अब इन दृश्यों को देखकर चुप हो चुकी थी। उसके पिछले जन्म दिन पर दिलाये हुए महंगे कमरे कै लैंस बदलकर वो गाड़ी रूकवाकर कुछ अच्छे फोटो खेंचना चाहती थी, लेकिन मेरा ध्यान जल्दी से जल्दी गैंण्डौली पहुँचने की तरफ था। उसने भी रूकने की जिद् नहीं की। खण्डहर महलों में मेरे साथ घूमकर उनके बारे में जानना उसे भी अच्छा लगता है। हम जैसे लोग तो लेख लिखने की फिराक में रहते हैं लेकिन उसकी पीढ़ी तो फोटुओं या वीडियो को तुरंत इंस्ट््राग्राम या लाइव फेसबुक पर साझा कर लेती है। 


गैण्डौली एक ऐतिहासिक स्थान है, हालाँकि इसके बारे में अब कम लोग जानते हैं। यह स्थिति तो तब है जब मैथिली शरण गुप्त जैसे महान रचनाकार ने गैण्डौली से जुड़े प्रसंग पर ‘रंग में भंग’ नामका खण्डकाव्य लिखा था। इसका पहला प्रकाशन कदाचित सन् 1910 में हुआ। गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने बूँदी के नकली गढ़ की रक्षा के लिये भी एक हाड़ा वीर द्वारा जान देने वाले प्रसंग पर जो कहानी लिखी थी उसका संबंध भी मूल रूप से गैण्डौली के ही एक प्रसंग से था। मैथिली शरण गुप्त ने भी ‘रंग में भंग’ नामक अपनी रचना में इस प्रसंग काजिक्र किया है। मैं पत्नी और बेटी को इस बारे में बताता जा रहा था और गैण्डौली को लेकर उन दोनों की उत्सुकता भी निरंतर बढ़ती जा रही थी।


हुआ यों था कि तेरहवीं सदी में गैण्डौली बूँदी राज्य का एक प्रमुख सूबा था। बूँदी के शासन पर जब  का नियंत्रण था, गैण्डोली उनके अनुज लालसिंह के अधीन था। लालसिंह की एक बेहद सुंदर बिटिया थी। बेटियाँ किस पिता को असुंदर लगती हैं और यों भी जब राजा की बेटी से जुड़ा कोई किस्सा इतिहास में लिखा जाता है तो प्रायः यही बताया जाता है कि राजकुमार अद्भुत सौंदर्य की धनी थी। संभव है कि हो भी सहीं राजकुमारी का रिश्ता चित्तौड़ के शासक खेतल से तय किया गया। जिसय दिन गैण्डौली के प्रमुख सरदार राजपुराहित के साथ लगन का शगुन लेकर चित्तौड़ के दरबार में पहुँचे, उसी दिन दरबार में एक शिल्पकार एक देवी की मूर्ति बनाकर ले कर आया था। इस मूर्ति का एक हाथ ऊपर की ओर इंगित कर रहा था और दूसरा हाथ देखने वाले की ओर। देखने वालों ने इस मूर्ति की खूब प्रशंसा की। राणा खेतल ने दरबार में मौजूद अपने राजकवि बारू जी से पूछा कि उनका क्या कहना है तो बारू जी ने एक छंद पढ़ा जिसका आशय यह था कि हे नरेश, यह प्रतिमा कहना चाहती है कि इस संपूर्ण संसार में तुमसे बड़ा कृपालु कोई नहीं है। सबने बारूजी के इस छंद पर वाह- वाह किया। राणा जी ने शिल्पकार और कवि दोनों को ईनाम दिया। गैण्डोली के भद्रजन भी सम्मानित किये गये।


लगन का शगुन लेकर गई टोली के सदस्यों ने लौटकर बारू जी के छंद की बात भी राजा को बताई। नीयत मुहुर्त पर बारात चित्तौड़ से गैण्डौली के लिये चली और तीन दिन में पहुँच गई। बारात का भव्य स्वागत हुआ। गैण्डौली को दुल्हन की तरह सजाया गया। धूमधाम से विवाह हुआ। जब दुल्हन की विदाई का समय आया तो दोनों प़क्षों के संभ्रान्त जन बैठे। किसी ने बारू जी को इस अवसर पर कविता सुनाने के लिये कह दिया। इससे पहले कि बारू जी कुछ कह पाते, गैण्डौली के राजा ने उन्हें रोकते हुए कहा -‘‘रहने दो बारू जी को अतिरंजित बात कहने की आदत है। उन्हें श्रेण्ठ सर्जना की शक्ति मिली है लेकिन इस शक्ति का दुरूपयोग नहीं किया जाना चाहिये। उस दिन जब चित्तौड़ के दरबार में वह सुंदर प्रतिमा आई थी तो बारू जी ने क्या कहा था? यही ना कि मूर्ति कह रही है कि राणा खेतल के समान सारे संसार में कोई दानी नहीं है? क्या राणा जी उस परमात्मा से भी बड़े दानी हो गये जिसने यह खूबसरूत संसार बना कर दिया है? चाटुकारिता के समय भी व्यक्ति को शब्दशक्ति के सम्मान की तो रक्षा करनी चाहिये थी।’’ मेजबान की यह कड़वी बात सुनकर सभा में सन्नाटा खिंच गया। कुछ लोगों ने गैण्डोली के राजा को समझाने की कोशिश की कि मेहमानों से ऐसा बर्ताव नहीं करते लेकिन उन्होंने कवि बारू जी को खरी खोटी सुनाना जारी रखा। बारू जी के लिये यह अपमान सहना अब मुश्किल हो गया था। उन्होंने वहीं अपनी तलवार से अपनी गर्दन काट ली। खून की पतली सी धार तो बही लेकिन इसने बड़ा संकट खड़ा कर दिया। अब मामला बारू जी के सम्मान का नहीं रह गया था, चित्तौड़ के सिसोदियाओं के सम्मान का हो गया था और चित्तौड़ के जांबांजों ने तो अपने सम्मान की कीमत पर कोई भी समझौता करना सीखा ही नहीं था।


राणा खेतल ने समझाने की कोशिश भी की लेकिन बात नहीं बनी। बारात में आए सिसोदियाओं ने अपनी अपनी तलवारें निकाल लीं । फिर वही हुआ जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। दोनों पक्षों में युद्ध हुआ। बाराती मारे गये। गैण्डोली के पक्ष को भ

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