गैण्डोली एक छोटा सा कस्बा है और मेरे घर से करीब साठ किलोमीटर दूर स्थित है। अब अपने घर से साठ किलोमीटर दूर की यात्रा करना भी भला किसी वृतांत का विषय हो सकता है? प्रारंभ में शायद आप यही सवाल करेंगे लेकिन जब मेरे अनुभव को जानेंगे तो कदाचित आपकी भावना परिवर्तित हो जाए।


करीब पैंतीस साल पहले, जब मैंनें तेरह वर्ष के एक किशोर कवि के रूप में हिन्दी कविसम्मेलनों में काव्यपाठ शुरू किया था,उस समय दक्षिण पूर्वी राजस्थान के कवि मंचों पर मेरे शहर के कवि- गीतकार प्रेमजी प्रेम की तूती बोला करती थी। वो एक कुशल मंच संचालक थे और मधुर गीतकार भी। कुछ समय बाद मैंने और प्रेमजी प्रेम ने अपने अंचल की अचर्चित पुरा संपदाओं पर पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखने प्रारंभ किये। उन्हीं दिनों प्रेमजी प्रेम ने एक यात्रा के दौरान बताया था कि बूँदी जिले के एक छोटे से गाँव में कई महलों के खण्डहर हैं और उन खण्डहरों से लिपटी हुई गौरव गाथा इतिहास के भाल पर केसर तिलक की तरह है। मैंने आग्रह किया कि वो अगली बार जब गैण्डोली जाऐं, तब मुझे भी साथ ले लें। बात आई गई हो गई। कुछ समय बाद ही प्रेमजी प्रेम वहाँ चले गये जहाँ से लौटकर कोई नहीं आता। लेकिन गैण्डोली की कथा का कौतुहल मेरे मन में बना रहा।


सन् 2012 के आसपास मैंने बिटिया से वादा किया कि मैं उसे अपने अंचल की पुरा संपदा दिखाऊँगा। दरअसल, उसे शिकायत थी कि मैं उसे अपने साथ कहीं लंबी यात्रा पर नहीं ले जाता जबकि उसकी सहेलियाँ उस वर्ष की गर्मी की छुट्टियों में दूरदराज के किले -महल देख कर आई हैं। बिटिया की उम्र उस समय साढ़े दस साल थी और अपने वादे के मुताबिक मैंने उसे अपने अंचल में और आसपास स्थित शेरगढ़, तारागढ़, गागरौन, भैंसरोडगढ़, चित्तौड़गढ़, इंद्रगढ़ जैसे दुर्ग, कई पुरास्थल, मंदिर आदि दिखाए। हर जगह की अपनी खूबसूरती, हर जगह का अपना भव्य इतिहास। शुरू में हम तीन परिवार अपनी अपनी गाड़ियों से जाते थे और इस तरह एक दर्जन से अधिक व्यक्तियों का समूह साथ होता था लेकिन इस बार अर्थात् 2017 की गर्मी की छुट्टियों में ऐसा कुछ हुआ कि सबका एक साथ जाने का संयोग ही नहीं बन सका। हालांकि गर्मी की ये छुट्टियाँ बिटिया अपने नाना-नानी और मम्मी के साथ अपनी मौसी के यहाँ इंदौर बिता कर आई थी- लेकिन एक बेटी को अपने पिता के साथ भ्रमण में जो सुख मिलता है,उसे तो केवल महसूस किया जा सकता है। बिटियाऐं अपने पति में अपने पिता के स्वभाव के बिम्ब क्यों तलाशती हैं यदि इस सत्य को अनुभूत किया जाए तो ही इस बात को समझा जा सकता है कि किसी भी बेटी को अपने पिता के सान्निध्य में क्या सुख मिलता है।


बिटिया मेरी अकेली संतान है। मैं समझता हूँ कि इस उम्र में उमंगों और विचारों को बाँटने के लिये घर पर भी एक साथी की आवश्यकता होती है। कोशिश करता हूँ कि घर पर उसका साथी बन कर रह सकूँ। सावन का महीना आधा बीत चुका था। उस दिन हरियाली अमावस्या थी लेकिन बादलों ने मेरे शहर पर खुलकर करसना शुरू नहीं किया था। अलबत्ता उस दिन आसमान पर बादल अवश्य थे। मौसम घूमने लायक था। बिटिया ने अपनी इच्छा जताई और मैंने भी हाँ भर ली। लेकिन समूह के अन्य सदस्यों के अपने अपने तयशुदा कार्यक्रम थे। अंत में मैंने तय किया कि किसी के साथ के लिये रूकने या किसी को साथ देने के लिये बाध्य करने की अपेक्षा अच्छा यही होगा कि अपने हिस्से की यात्रा खुद की जाए। श्रीमती जी को बताया तो वो भी साथ जाने को तैयार हो गईं। सवाल यह था कि कहाँ चला जाए?


अचानक बरसों पुरानी सुनी हुई बातें याद आ गईं और गैण्डौली जाने का निश्चय कर लिया। इसका एक मूल कारण यह भी था कि कुछ दिनों पहले ही बड़े जियाजी के यहाँ उनके पुराने मित्र अजय भार्गव से मुलाकात हुई थी। अजय भार्गव काफी समय तक गैण्डौली में थानेदार रहे थे और कुछ समय पहले ही सेवानिवृत्त हुए हैं। उन्होंने न केवल गैण्डौली का रास्ता समझाया बल्कि गैण्डौली के बारे में कुछ अन्य रोचक बातें भी बताईं। मसलन- कैसे उन्हें बताया गया कि थाने के परिसर में कोई आहट सुनाई देती है और कैसे उन्होंने एक अमावस की पूरी रात किसी अदृश्य की आहट सुनते हुए बिताई, और वह भी तब जबकि परिसर में बिजली का प्रबंध तो था ही नहीं, केवल टॉर्च और मोमबत्ती की रोशनी का आसरा था। उन्होंने यह भी बताया कि गाँव में कुछ बहुत ही खूबसूरत बावड़ियाँ भी हैं और कुछ दूर चलकर खटकड़ नामक गाँव जाया जाए तो वहाँ भी कुछ दर्शनीय प्राचीन मठ हैं। उन्होंने ही बताया कि मेरे शहर से गैण्डौली की दूरी पैंतीस किलोमीटर है। हालाँकि जाने पर यह दूरी लगभग दुगुनी मिली।


मैं, पत्नी और बिटिया तीनों कार में बैठे और बढ़ चले गैण्डौली की ओर। पत्नी ने यह सोचकर थोड़ा नाश्ता साथ ले लिया कि भूख लगी तो काम आएगा। कापरेन तक गाड़ी अपनी गति से दौड़ी। फॉरलेन रास्ते को छोड़कर अंदर की ओर मुड़े तो चारों तरफ हरियाली हमारे स्वागत के लिये उत्सुक मिली। सिंगल लेन रास्ता था और उस पर कई खतरनाक घुमाव भी थे। बीच बीच में छोटे छोटे गाँव और आसमान पर बादल। बारिश शुरू नहीं हुई थी लेकिन बिटिया और पत्नी दोनों को ही इस छोटी यात्रा में आनंद मिल रहा था। तीन- चार जगह रूककर गैण्डौली का रास्ता पूछा तो पता चला कि कोटा से आने वाला एक और रास्ता है और तुलनात्मक दृष्टि से वह ज्यादा अच्छा है। कहने वालों ने यह क्यों कहा यह तब पता चला जब दो जगहों पर रूककर यह सोचना पड़ा कि कार को आगे कैसे ले जाया जाए। 


मुख्य मार्गों को छोड़कर जब अंदर वाले रास्तों की ओर जाया जाता है तब पता चलता है कि हमारा गणतंत्र अभी भी किन चुनौतियों का सामना कर रहा है। अभी भी गाँवों सड़कों के नाम पर संकरी पगडंडियाँ हैं, अभी भी खेत किनारे बैठे लोग स्वच्छता अभियान की धज्जियाँ उड़ाने पर आमादा हैं, हालाँकि शहरों में वाहनों की बढ़ती संख्या ने कई परेशानियाँ पैदा कर दी हैं लेकिन अभी भी गाँवों में ऐसे लोग मौजूद हैं जो कार से गुज़रते हुए परिवार को बड़े कौतुहल के साथ देखते हैं। हाँ, गाँवों में बाजार की पैठ सब तरफ है। गाँवों में हर चाय की थड़ी के बाहर एक शानदार फ्रेम में सजी हुई पानी की और शीतल पेय की बोतलें सजी हुई देखी जा सकती हैं, मोबाइल सब जगह पहुँच गये हैं, छतों पर केबल टी वी के वास्ते डिश प्लेट लगी हुई हैं। अच्छे स्कूल, डिस्पेंसरी या साफ पेयजल आपूर्ति का यथोचित प्रबंधन भले ही सब गाँवों के पास नहीं हो लेकिन मुफ्त के डेटा वाले नेटवर्क की सुविधा हो तो बहुत से ग़मों को भुलाया जा सकता है शायद! मेरे ही अंचल के लोकप्रिय जनकवि ठाड़ा ‘राही’ का एक गीत याद आ गया -‘‘हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं।’’


हालाँकि इतनी लोकतांत्रिक परिपक्वता हम लोगों में आ चुकी है कि हम ग्रामीण क्षैत्रों में घुसते समय ही विकास के दावों के दूसरे पक्ष को स्वीकार करने के लिये तैयार हो जाते हैं। इसीलिये बिटिया को जब ग्रामीण इलाके में अपने घर से दूर पानी भरने के लिये सिर पर स्टील की चरियाँ लिये हुए महिलाओं का समूह दिखा या गहरे कीचड़ में भी अपनी बेंत के सहारे मुस्कुराता हुआ बुजुर्ग दिखा तो उसके लिये ये केवल फोटो के पात्र रहे। कुछ समय पहले गाँवों की हरियाली और अपेक्षाकृत शांत जीवन देखकर यह कहने वाली बिटिया कि ‘मुझे तो आप ऐसे ही इलाके में रहने के लिये छोड़ दो’’ अब इन दृश्यों को देखकर चुप हो चुकी थी। उसके पिछले जन्म दिन पर दिलाये हुए महंगे कमरे कै लैंस बदलकर वो गाड़ी रूकवाकर कुछ अच्छे फोटो खेंचना चाहती थी, लेकिन मेरा ध्यान जल्दी से जल्दी गैंण्डौली पहुँचने की तरफ था। उसने भी रूकने की जिद् नहीं की। खण्डहर महलों में मेरे साथ घूमकर उनके बारे में जानना उसे भी अच्छा लगता है। हम जैसे लोग तो लेख लिखने की फिराक में रहते हैं लेकिन उसकी पीढ़ी तो फोटुओं या वीडियो को तुरंत इंस्ट््राग्राम या लाइव फेसबुक पर साझा कर लेती है। 


गैण्डौली एक ऐतिहासिक स्थान है, हालाँकि इसके बारे में अब कम लोग जानते हैं। यह स्थिति तो तब है जब मैथिली शरण गुप्त जैसे महान रचनाकार ने गैण्डौली से जुड़े प्रसंग पर ‘रंग में भंग’ नामका खण्डकाव्य लिखा था। इसका पहला प्रकाशन कदाचित सन् 1910 में हुआ। गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने बूँदी के नकली गढ़ की रक्षा के लिये भी एक हाड़ा वीर द्वारा जान देने वाले प्रसंग पर जो कहानी लिखी थी उसका संबंध भी मूल रूप से गैण्डौली के ही एक प्रसंग से था। मैथिली शरण गुप्त ने भी ‘रंग में भंग’ नामक अपनी रचना में इस प्रसंग काजिक्र किया है। मैं पत्नी और बेटी को इस बारे में बताता जा रहा था और गैण्डौली को लेकर उन दोनों की उत्सुकता भी निरंतर बढ़ती जा रही थी।


हुआ यों था कि तेरहवीं सदी में गैण्डौली बूँदी राज्य का एक प्रमुख सूबा था। बूँदी के शासन पर जब  का नियंत्रण था, गैण्डोली उनके अनुज लालसिंह के अधीन था। लालसिंह की एक बेहद सुंदर बिटिया थी। बेटियाँ किस पिता को असुंदर लगती हैं और यों भी जब राजा की बेटी से जुड़ा कोई किस्सा इतिहास में लिखा जाता है तो प्रायः यही बताया जाता है कि राजकुमार अद्भुत सौंदर्य की धनी थी। संभव है कि हो भी सहीं राजकुमारी का रिश्ता चित्तौड़ के शासक खेतल से तय किया गया। जिसय दिन गैण्डौली के प्रमुख सरदार राजपुराहित के साथ लगन का शगुन लेकर चित्तौड़ के दरबार में पहुँचे, उसी दिन दरबार में एक शिल्पकार एक देवी की मूर्ति बनाकर ले कर आया था। इस मूर्ति का एक हाथ ऊपर की ओर इंगित कर रहा था और दूसरा हाथ देखने वाले की ओर। देखने वालों ने इस मूर्ति की खूब प्रशंसा की। राणा खेतल ने दरबार में मौजूद अपने राजकवि बारू जी से पूछा कि उनका क्या कहना है तो बारू जी ने एक छंद पढ़ा जिसका आशय यह था कि हे नरेश, यह प्रतिमा कहना चाहती है कि इस संपूर्ण संसार में तुमसे बड़ा कृपालु कोई नहीं है। सबने बारूजी के इस छंद पर वाह- वाह किया। राणा जी ने शिल्पकार और कवि दोनों को ईनाम दिया। गैण्डोली के भद्रजन भी सम्मानित किये गये।


लगन का शगुन लेकर गई टोली के सदस्यों ने लौटकर बारू जी के छंद की बात भी राजा को बताई। नीयत मुहुर्त पर बारात चित्तौड़ से गैण्डौली के लिये चली और तीन दिन में पहुँच गई। बारात का भव्य स्वागत हुआ। गैण्डौली को दुल्हन की तरह सजाया गया। धूमधाम से विवाह हुआ। जब दुल्हन की विदाई का समय आया तो दोनों प़क्षों के संभ्रान्त जन बैठे। किसी ने बारू जी को इस अवसर पर कविता सुनाने के लिये कह दिया। इससे पहले कि बारू जी कुछ कह पाते, गैण्डौली के राजा ने उन्हें रोकते हुए कहा -‘‘रहने दो बारू जी को अतिरंजित बात कहने की आदत है। उन्हें श्रेण्ठ सर्जना की शक्ति मिली है लेकिन इस शक्ति का दुरूपयोग नहीं किया जाना चाहिये। उस दिन जब चित्तौड़ के दरबार में वह सुंदर प्रतिमा आई थी तो बारू जी ने क्या कहा था? यही ना कि मूर्ति कह रही है कि राणा खेतल के समान सारे संसार में कोई दानी नहीं है? क्या राणा जी उस परमात्मा से भी बड़े दानी हो गये जिसने यह खूबसरूत संसार बना कर दिया है? चाटुकारिता के समय भी व्यक्ति को शब्दशक्ति के सम्मान की तो रक्षा करनी चाहिये थी।’’ मेजबान की यह कड़वी बात सुनकर सभा में सन्नाटा खिंच गया। कुछ लोगों ने गैण्डोली के राजा को समझाने की कोशिश की कि मेहमानों से ऐसा बर्ताव नहीं करते लेकिन उन्होंने कवि बारू जी को खरी खोटी सुनाना जारी रखा। बारू जी के लिये यह अपमान सहना अब मुश्किल हो गया था। उन्होंने वहीं अपनी तलवार से अपनी गर्दन काट ली। खून की पतली सी धार तो बही लेकिन इसने बड़ा संकट खड़ा कर दिया। अब मामला बारू जी के सम्मान का नहीं रह गया था, चित्तौड़ के सिसोदियाओं के सम्मान का हो गया था और चित्तौड़ के जांबांजों ने तो अपने सम्मान की कीमत पर कोई भी समझौता करना सीखा ही नहीं था।


राणा खेतल ने समझाने की कोशिश भी की लेकिन बात नहीं बनी। बारात में आए सिसोदियाओं ने अपनी अपनी तलवारें निकाल लीं । फिर वही हुआ जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। दोनों पक्षों में युद्ध हुआ। बाराती मारे गये। गैण्डोली के पक्ष को भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। रंग में भंग हो गया। जो राजकुमारी अपने हाथों में मेंहदी लगाए पति के साथ विदा की प्रतीक्षा कर रही थी, उस राजकुमारी को संदेश मिला कि राणा खेतल सहित सारे सिसोदिया वीरगति को प्राप्त हो गये। क्षत्राणी के सपने बिखर गये। लेकिन संकल्प ने जन्म ले लिया। लोगों ने बहुत समझाया लेकिन राजकुमारी नहीं मानी। उस समय की रीति के अनुसार अपने पति की चिता पर उसने भी प्राणोत्सर्ग कर दिया। 


शब्दों का दुरूपयोग किस तरह तिल का ताड़ बनकर रंग में भंग कर देता है, यह घटना इसका प्रमाण है। शायद इसलिये शब्द शक्ति को ब्रह्म माना गया है और जहाँ ब्रह्म के अस्तित्व का अंश भी हो, वहाँ बहुत धैर्य और संयम के साथ प्रवेश करना चाहिये। गैण्डोली वाले प्रसंग में बात यहीं पर खत्म नहीं हुई। कुछ समय बाद चित्तौड़ के सिंहासन पर राणा लाखा बैठे। चित्तौड़ के राजनीतिक और सामरिक पराक्रम का अपना प्रभामण्डल था। विवाह के लिये चित्तौड़ के राणा की बारात को गैण्डौली बुलाकर राजकवि के साथ अपमानजनक व्यवहार का दंश अभी भी उनके मन में कायम था। गैण्डौली तो बूँदी राज्य की एक जागीर मात्र थी। राणा लाखा ने प्रण कर लिया कि वो जब तक बूँदी का मान मर्दन नहीं कर देंगे, जब तक बूँदी के गढ़ को जीत नहीं लेंगे- तब तक अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे। अफरातफरी मच गई। बूँदी के दुर्गम गढ़ को आनन फानन में जीतना संभव नहीं था। चित्तौड़ के भद्रजन फिर जुटे। राणा को समझाने की कोशिश की कि इस जिद् में अपने प्राणों से खिलवाड़ करने से कया हासिल होगा। बिना पर्याप्त तैयारियों के बूँदी को जीता नहीं जा सकता। तैयारियों के लिये उनका स्वस्थ रहना आवश्यक है। इसलिये वो भोजन तो करें। बूँदी को जीतने के लिये तैयारियाँ भी चलती रहेंगी। लेकिन सूर्यवंशी अपने प्रण को कैसे तोड़ दें? तब यह युक्ति निकाली गई कि अपनाप्रण रखने के लिये राणा बूँदी के प्रसिद्ध तारागढ़ दुर्ग की प्रतिकृति को जीत लें।


चित्तौड़ में बूँदी के दुर्ग की प्रतिकृति तैयार होने लगी। चित्तौड़ की सेना में बूँदी का सैनिक हाड़ा कुंभा भी था। शिकार से लौटते समय कुंभा हाड़ा ने नकली गढ़ तैयार होते देखा तो पूछा कि माजरा क्या है? लोगों ने उसे सच बता दिया। कुंभा को सारी बात समझ में आ गई। लेकिन जब राणा बूँदी के नकली गढ़ को जीतने के लिये आए तो कुंभा उनके सामने आ गया। उसने साफ कह दिया कि उसके जिन्दा रहते हुए तो कोई उसकी जन्मभूमि के नकली गढ़ को भी नहीं जीत सकेगा। कुंभा ने राणा को युद्ध की चुनौती दी और वह दुर्धर्ष यौद्धा अपनी जन्मभूमि के नकली गढ़ की रक्षा करते हुए शहीद हो गया।


ये घटना सदियों से लोगों को ‘जननी-जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी’’ का अर्थ समझा रही है। हम लोग उसी गैण्डोली की तरफ बढ़े जा रहे थे, जहाँ एक कवि के आत्म बलिदान ने समूची बारात को युद्ध के लिये उकसा दिया था। आसमान में बादल छितराए हुए थे। ठण्डी हवा चल रही थी। लेकिन बीच बीच में निकलती धूप आश्वस्त कर रही थी कि फिलहाल बरसात नहीं होगी। गैण्डौली गाँव में पहुँचते ही मुख्यमार्ग पर बहुत से लोग मिल गये। उन्होंने बता दिया कि सामने हल्की सी चढ़ाई वाला जो रास्ता है उस पर सीधे चले जाओ। महलों तक पहुँच जाओगे। एक ग्रामीण बोला -‘‘चिन्ता मत करो। कार चली ज्यावैगी।’’ मैंने गाड़ी के गेयर बदले और उस रास्ते पर बढ़ गया। कुछ देर बाद वीरान इलाका सामने आया और फिर खस्ताहाल खण्डहर। बिटिया तो उन खण्डहरों को देखकर रोमांचित हो गई। शानदार फोटो खींचने की संभावनाऐं जो सामने थीं। श्रीमती जी तो सिर्फ इसलिये प्रसन्न थीं कि बहुत दिनों बाद उन्हें एक अच्छे मौसम में मेरे साथ कथित आउटिंग का मौका मिला था।


उजाड़ महलों के परिसर के बाहर कार खड़ी करके मैं और बिटिया अपने अपने कैमरों से फोटो खींचने में व्यस्त हो गये। कुछ जर्जर ईमारतों के अलग अलग कोणों से फोटो लेने के बाद मैं एक अत्यंत जीर्ण ईमारत की छत पर चढ़ गया। बिटिया पीछे आने लगी तो मैंने उसे रोक दिया। टूटी हुई सीढ़ियों का जितना सा अंश बाकी था, वह भी वजन झेल पाए या नहीं इसमें संशय था। बिटिया ने शिकायत की कि जब मैं खुद ऊपर जा चढ़ा हूँ तो उसे आने से क्यों रोक रहा हूँ। मैं उसे कैसे समझाता कि कोई पिता सारे खतरे स्वयं मोल लेने के बावजूद अपनी संतति को उन खतरों से दूर रहने की सलाह क्यों देता है? कुछ बातें जीवन अनुभवों से ही समझ में आती हैं। मैं खामोश रहा। केवल इतना ही कहा कि अब आगे चलेंगे। मैं खुद नीचे आ रहा हूँ। हमें अभी और भी ईमारतें देखनी हैं। मुझे बताया गया था कि गाँव की दूसरी दिशा में एक बहुत ही सुंदर स्थापत्य कला वाली बावड़ी है। उसे भी तो देखना था। फिर गाँव में ही उन बाबा बजरंग दास से भी मिलने का मन था, जिन्होंने गैण्डौली के लिये बिहार के दशरथ मांझी की ही तरह पहाड़ का सीना चीरकर रास्ता बनाने का सपना देखा था और इस सपने को आकार भी दिया। यह अलग बात है कि यह काम वनविभाग की आपत्ति के कारण अपने अंतिम चरण तक पहुँचने के बाद रोक देना पड़ा लेकिन गाँव वालों को यह सीख तो मिल ही चुकी थी कि ‘‘लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती/ कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।’’ (डॉ.हरिवंश राय बच्चन की एक प्रसिद्ध कविता।)


लोक में एक प्रसिद्ध उक्ति है कि तेरे मन कछु और है/ दाता के कछु और। भले ही गैण्डोली मेरे शहर से करीब डेढ़- पौने दो किलोमीटर की ड््राइव पर था लेकिन मैं इसकी कहानियों से भिज्ञ होने के बावजूद करीब दो दशक बाद यहाँ जाने का समय अवसर पा सका था। बिटिया खण्डहरों को देखकर रोमांचित थी और उसके कैमरे के शटर की आवाज रह रह कर सन्नटे में गूँज रही थी। दूर तक पसरे पड़े वीराने में कभी कभी किसी पक्षी की या दूर से कुत्तों के भौंकने की आवाजें आ रही थी। जिस ईमारत की छत पर मैं जैसे- तैसे चढ़ गया था, उससे नीचे उतरा ही था कि बारिश शुरू हो गई और देखते ही देखते बादलों ने तेजी से बरसना शुरू कर दिया था। हम लोग दौड़कर अपनी कार तक पहुँचे। यह सोचकर कि बारिश रूक जाने के बाद फिर परिसर में घूम लेंगे। लेकिन पौन घंटे तक गाड़ी में हम बादलों का मिजाज शांत होने का इंतजार करते रहे और बाहर मूसलाधर पानी बरसता रहा। जब पानी रूकने के कोई आसार नहीं दिखे तो डर लगने लगा कि कहीं नीचे सड़क पर इतना पानी इकट्ठा नहीं हो जाए कि निकलना ही मुश्किल हो जाए। फिर रास्ते में मेज नदी पड़ती थी और डर था कि उसका पानी पुलिया तक न चढ़ आए। मैंने पत्नी से कहा कि अब लौट चलें। बारिश रूकती नहीं दिखती। पत्नी ने कहा यों भी इतनी बारिश के बाद इन झाड़ियों और घासफूस के बीच घूमना सुरक्षित नहीं है। जहरीले कीड़े या साँप हो सकते हैं। बिटिया तो मूसलाधार बरसात देखकर ही खुश थी और अब कैमकॉर्डर में बारिश का वीडियो बना रही थी।


गाँव की गलियों में सचमुच पानी भर चुका था लेकिन हम जैसे तैसे निकल आए। इस बार तय किया कि उस रास्ते से लौटेंगे नहीं, जिस रास्ते से आये हैं। दूसरा रास्ता इतना खराब नहीं होगा। गाँव के चौराहे पर एक दूकान वाले से पूछा तो उसने सिर्फ इतना कहा कि कोशिश कर लो। हम गैण्डौली से बाहर निकले ही थे कि करीब दो किलोमीटर बाद एक भव्य मंदिर दिखा।नाम था कंचनधाम। उत्युकतावश वहाँ रूक गये। पता चला कि इस परिसर में द्वादश ज्योतिर्लिंगों के प्रतिरूप स्थापित किये गये हैं। मंदिर के मुख्य महंत जयपुर एक राजनीतिक पार्टी द्वारा आयोजित संत सम्मेलन में भाग लेने गये हुए थे। मुझे सहज ही अपनी इस जिज्ञासा का समाधान मिल गया कि जंगल की जमीन के इतने बड़े हिस्से पर इतना बड़ा निर्माण कैसे हो गया। वहाँ मुख्य संत के बाद कर्ताधर्ता की भूमिका निभा रहे अमन मुंद्गल ने एक नई जानकारी दी। उनका कहना था कि भारत भर में लोकप्रिय सत्यनारायण की कथा के तीसरे भाग में जो जिस गणनापुरी नामक स्थल का जिक्र है, वह गैण्डौली का ही मूल नाम है और आज जहाँ कंचनधाम बनाया गया है, सतयुग में वहाँ पर कंचनपुरी नामक स्थान था और कंचनधाम के मुख्य संत को इस स्थान पर यह मंदिर बनाने की दैवीय प्रेरणा उस समय मिली, जब वो कुछ भक्तों के आग्रह पर इस रास्ते से गैण्डोली की ओर जा रहे थे। सन् 2004 में यह धाम बनना शुरू हुआ और 2014 में यहाँ शिवलिंगों की प्राण प्रतिष्ठा हुई। अमन मुद्गल ने यों तो चमत्कारों के और भी बहुत से दावे किये लेकिन तर्क की कसौटी पर उन्हें कसे बिना उनका उल्लेख अनावश्यक प्रतीत होता है। हाँ, जब मैंनें गैण्डौली और मैथिलीशरण गुप्त के खण्ड काव्य की बात की तो मुद्गल अंदर जाकर ‘रंग में भंग’ की एक प्रति निकाल लाए। कदाचित वो यह भी जताना चाहते थे कि उन्हें सब पता है।


कंचनधाम से करीब बारह-पंद्रह किलोमीटर दूर है गाँव खटकड़। यहाँ एक पहाड़ी पर एक प्राचीन गठ है जिसे धुंधलेश्वर के नाम से जाना जाता है। कभी इस मठ में धूँधला बाबा के नाम से मशहूर महंत की एक विशाल प्रतिमा होती थी- जो शुद्ध नीलम पत्थर से बनी थी लेकिन इसे मूर्ति चोरों ने चुरा लिया। अब लगभग उतनी ही बड़ी एक सादा पत्थर की प्रतिमा परिसर में स्थापित है। करीब सौ फुट ऊपर चढ़ने के बाद मैं जब परिसर में पहुँचा तो मेरा स्वागत तेजी से इधर से उधर जाती कुछ चमगादड़ों ने किया। परिसर में सन्नाटा था और गंबगी इतनी कि उसके कारण उत्पन्न होने वाली दुर्गंध सीधे दिमाग में चढ़ गई।इस ऐतिहासिक परिसर में ऐसा कुछ भी नहीं था जिसे दर्शनीय कहा जा सके। सीढ़ियों के अँधेरे और चमगादड़ों की हलचल को देखकर ठिठकी हुई बेटी और पत्नी को मैंने जोर से आवाज लगाई और कहा कि वो चाहें तो ऊपर नहीं आऐं। वहाँ कुछ भी विशेष नहीं है। सिवाय एक प्रतिमा के जो मूल प्रतिमा के चोरी चले जाने के बाद स्थापित की गई है और अपनी उपेक्षा की कहानी कह रही है। बेटी और पत्नी नीचे ही रूक गये। बेटी ने पहाड़ी के उस हिस्से पर कुछ फोटो खिंचवाए, कुछ सेल्फियाँ लीं और हम नीचे उतर आए। मैं अपने जूते कार में ही छोड़ गया था। मैंने उन्हें पहनना जरूरी नहीं समझा और जब सब बैठ गये तो मैंने नंगे पाँव ही एक्सीलेटर को दबा दिया।


हालांकि इस मठ के ठीक सामने एक सुंदर मंदिर था लेकिन अब शाम घिरने लगी थी और मेरी इच्छा थी कि बारिश के मौसम में अंधेरा घिरने के पहले ही अपने शहर के आसपास तो कम से कम पहुँच लिया जाए। अभी तो यह भी पता नहीं था कि रास्ता कैसा है। लेकिन शुक्र है कि रास्ता तुलनात्मक दृष्टि से ठीक निकला। हालांकि इस रास्ते पर पड़ने वाले गाँव भी विकास के दावों की खिल्ली उसी तरह से उड़ा रहे थे जिस तरह से दूसरी तरफ वाले रास्ते पर पड़ने वाले गाँव। लेकिन इस बार सड़क की हालत उस नेता की तरह पतली नहीं थी जिसकी जमानत ही जब्त हो जाए। खटकड़ से केशवरायपाटन होते हुए हम अंधेरा घिरने के पहले अपने घर पहुँच गये। बेटी और पत्नी कह रहे थे कि उन्हें इस यात्रा में बहुत आनंद आया लेकिन मेरे दिमाग में गैण्डोली के खण्डहर हो चुके महलों की छवि घूम रही थी और मैं खुद से ही सवाल कर रहा था -‘जर्जर हो चुके इन महलों को किसी बेटी के जीवन में दुर्भाग्य आहूत करने की दण्ड मिला या समय ने किसी मर्यादा के उल्लंघन के कारण बद्दृआ दी थी। याद आया कि जिस खण्डहर से उतरते ही गैण्डौली में मुझे मूसलाधार बारिश का सामना करना पड़ा था, वह कभी एक भव्य मंदिर रहा होगा और मैं जूते पहने हुए ही उसकी छत पर चढ़ गया था। क्या यही कारण रहा कि मुझे अपनी गैण्डौली यात्रा अधूरी छोड़ कर लौटना पड़ा? मैंने अजाने ही अपने कान छूकर इस अपराध के लिये क्षमा माँगी और जब पत्नी ने पूछा कि क्या हुआ तो अपनी खिसियाहट मिटाने के लिये जोर से हँस दिया।



- अतुल कनक



अतुल कनक राजस्थानी भाषा के विख्यात साहित्यकार हैं। इनके द्वारा रचित एक उपन्यास जूण–जातरा के लिये उन्हें सन् 2011 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।


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