धर्मशास्त्र में लिखा है - शङ्करात् ज्ञानमन्विच्छेत्।


अर्थात् ज्ञान पाने के इच्छुक को महादेव की शरण में चले जाना चाहिए। इस नाते ज्ञान—विज्ञान के क्षेत्र में कार्य कर रहे लोगों के लिए शिवाराधन पुरातन परंपरा है। ऋग्वेद से लेकर आधुनिक संस्कृत साहित्य तक लगभग सभी विद्वानों ने ज्ञान पाने के लिए महादेव की आराधना की है। वेदों में प्राय: उन्हें 'रुद्र' कहा जाता है। इस कारण उनकी महिमा में वैदिक ऋषियों ने अतुलनीय और अनुपम कविताओं का सृजन किया है। वेदों में वे शंभु, मयोभव, शिव, शंकर एवं मयस्कर जैसे सैंकड़ों प्रिय नामों से संबोधित किए गए हैं। वे नीलग्रीव हैं और सहस्राक्ष भी। 


महर्षि वाल्मीकि की रामायण से लेकर महाभारत और दूसरे पुराण शिव-महिमा से भरे पड़े हैं। कालिदास जैसे अमर कवि तो शिव के दीवाने हैं। उनके शिव और पार्वती, वाणी और अर्थ हैं, जो सदा-संयुक्त हैं तथा अभिन्न हैं। 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' का मंगलाचरण अनुपम है, जहां शिव केवल देवता नहीं बल्कि संसार की मूल 'मूर्ति' हैं। कालिदास के शिव 'अष्टमूर्ति' हैं - 


या सृष्टि: स्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री

ये द्वे कालं विधत्त: श्रुतिविषयगुणा: या स्थिता व्याप्य विश्वम्।

यामाहु: सर्वबीजप्रकृतिरिति यया प्राणिन: प्राणवन्त:

प्रत्यक्षाभि: प्रपन्न: तनुभि: अवतु व: ताभि: अष्टाभि: ईश:।।


जल की सृष्टि सबसे पहले हुई। इसके बाद 'अग्नि' है, जो विधि के साथ दी गई हवन सामग्री को ग्रहण करती है। 'होता' यज्ञ करने का काम करता है। 'सूर्य' और 'चन्द्र' दिन और रात निर्धारित करते हैं। 'आकाश' जिसका गुण शब्द है और जो संसार भर में रमा हुआ है। 'पृथ्वी' सब बीजों को उत्पन्न करने वाली है। 'वायु' के कारण सब जीव प्राण धारण किए हुए हैं। इस प्रकार जल, अग्नि, होता, सूर्य, चन्द्र, आकाश, पृथ्वी और वायु, इन आठ प्रत्यक्ष रूपों में जो भगवान् शिव सबको दिखाई देते हैं, वे शिव आप का कल्याण करें।


कालिदास के बहुत पहले से शिव की पूजा अर्ध पुरुष और अर्ध नारी के रूप में प्रचलित थी (मालविकाग्निमित्र का प्रथम पद्य एवं कुमारसम्भव 7/28)। 


शिव-पूजा सम्भवत: प्राचीनतम पूजा है। सर जॉन मार्शल के ग्रन्थ 'मोहेन्जोदड़ो' से पता चलता है कि सिन्धु घाटी की सभ्यता के समय सम्भवत: शिव-पूजा प्रचलित थी, क्योंकि एक चित्र में एक योगी के चतुर्दिक् हाथी, व्याघ्र, गैंडा एवं भैंसा पशु है (शिव को पशुपति भी कहा गया है।)। 


शिव को बहुधा पंचतुण्ड (पंचमुख-पंचानन) कहा जाता है और इनके पांच स्वरूप हैं (क्रम से) - सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष और ईशान। कालान्तर में शैवों और वैष्णवों में एक-दूसरे के विरुद्ध पर्याप्त कहा-सुनी हुई है, किन्तु महाभारत एवं पुराणों के काल में इनमें कोई वैमनस्य नहीं था प्रत्युत बड़ा सौहार्द एवं सहिष्णुता थी।


शिव की महिमा पर संस्कृत कवियों ने इतना विपुल साहित्य रचा है, जो ने केवल मनोहारी है बल्कि शृंगार, वीर, करुणा, अद्भुत, हास्य, भयानक, बीभत्स और रौद्र, सारे आठ रसों में अनूठी छवि का निर्माण करता है।


किसी संस्कृत कवि का यह श्लोक रोमांचित करता है, जो विलक्षण है -


पार्वती-फणि-बालेन्दु-भस्म-मन्दाकिनीयुत:।

पवर्गमण्डित: शम्भु: अपवर्गफलप्रद:॥


'प' वर्ग में पांच अक्षर हैं - प, फ, ब, भ और म। 


शिव 'पवर्ग' से सुशोभित हैं - प - पार्वती, फ - फणी (सर्प), ब - बालेन्दु (चंद्र), भ - भस्म और म - मंदाकिनी (गंगा। यह कैसा विरोधाभास है कि महादेव मंडित तो हैं 'पवर्ग' से पर अपने भक्तों को देते हैं 'अपवर्ग' यानी मोक्ष।