चार दशकों में सैंकड़ों ग्रन्थों को पढ़ना, उन्हें समझना और बिना किसी आग्रह के लिख देना क्या किसी के बस की बात है? नहीं ना, पर यह काम महाराष्ट्र में जन्में पांडुरंग वामन काणे ने जब 1962 में पूरा कर दिया तो भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा, 'काणेजी इस काम के लिए उन्हें भारत रत्न से भी बड़ा सम्मान दिया जाना चाहिए।' दूसरे संस्कृत आयोग के सदस्य एवं साहित्य अकादमी से सम्मानित वयोवृद्ध विद्वान् देवर्षि कलानाथ शास्त्री भाव—विभोर होकर कहते हैं कि यह होता है साधक की साधना का सम्मान। काणे स्वयं एक इतिहास हैं। उन्हें भारतीय विद्या पर गर्व तो था ही, साथ में पाश्चात्यों के फैलाए कुचक्र से भी वे भलीभांति परिचित थे। उन्होंने न केवल धर्मशास्त्र का इतिहास लिखा बल्कि युवाओं का प्रेरणा भी दी कि भारतीयता से जुड़े रहो, यही तुम्हारी पहचान भी है।
संस्कृत के साथ कानून की पढ़ाई भी -
कम लोग ऐसे हैं जो अध्ययन की कसौटी पर खुद को कसकर किसी अगम्य और दुर्बोध विषय पर ऐसा काम कर लेते हैं, जो हिमालय की चढ़ाई से कहीं अधिक ऊँचा होता है। बीती दो शताब्दियों में भारतीय चिंतन, धर्म और अध्यात्म को लेकर हुए कार्यों में अनेक ऐसे मनीषी हुए हैं, जिन्होंने प्रत्यक्ष इतिहास खड़ा किया। जब ऐसे विद्वानों की चर्चा होती है तो अग्रपंक्ति में डॉ. पांडुरंग वामन काणे का नाम आता है। काणे न केवल संस्कृत एवं प्राच्य विद्याओं के विशारद थे बल्कि विधिज्ञ भी थे।
संस्कृत के विद्वान्, कुलपति और संसद सदस्य-
डॉ॰ काणे संस्कृत के आचार्य, मुंबई विश्वविद्यालय के कुलपति तथा सन् 1953 से 1959 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। उन्होंने पेरिस, इस्तांबूल तथा कैंब्रिज के प्राच्यविज्ञ सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। साहित्य अकादमी ने 1956 ईस्वी में उन्हें 'धर्मशास्त्र का इतिहास' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया। भारत सरकार ने 1963 ईस्वी में काणे को 'भारतरत्न' के सर्वोच्च सम्मान से अलंकृत किया।
डॉ. काणे की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। आधुनिक भारत में उन जैसे प्रकाण्ड विद्वान गिने-चुने हैं। भारतीय ज्ञान कोश को समृद्ध करने में उनका योगदान अतुलनीय है। पर उनके महत्व को समझने के लिए आजादी से पहले के उथल-पुथल भरे व बिखरे हुए अभावग्रस्त भारत को याद करना चाहिए। गांवों, शहरों, आश्रमों में ज्ञान के स्रोत व ग्रंथ बिखरे हुए थे, कुछ ही पुस्तकालय ऐसे थे, जहां ग्रंथों की मौजूदगी ठीक—ठाक थी। भारतीय धर्मशास्त्र के समग्र अध्ययन में बहुत समस्या थी। यह जानना मुश्किल था कि किस धर्मशास्त्र या ग्रंथ की रचना कब हुई? यह रचना किसने की? क्यों की और उसका प्रभाव क्या था? उसका सामाजिक संदर्भ क्या था? ऐसे तमाम प्रश्नों के उत्तर खोजने की जैसी कोशिश काणे ने की, वैसी कोशिश ज्ञान जगत में दुर्लभ है।
व्यवहारमयूख से धर्मशास्त्र का इतिहास -
महाराष्ट्र के रत्नागिरि में 7 मई, 1880 को जन्मे काणे ने भी नहीं सोचा था कि वे भारतीय धर्मशास्त्र का इतिहास लिख डालेंगे। वे तो एक ग्रंथ 'व्यवहार—मयूख' की रचना में लगे थे और उस ग्रंथ को रचने के उपरांत उनके मन में आया कि पुस्तक का एक परिचय लिखा जाए, ताकि पाठकों को धर्मशास्त्र के इतिहास की संक्षिप्त जानकारी हो सके। धर्मशास्त्र की संक्षिप्त जानकारी देने के प्रयास में काणे एक ग्रंथ से दूसरे ग्रंथ, एक खोज से दूसरी खोज, एक सूचना से दूसरी सूचना तक बढ़ते चले गए, पृष्ठ दर पृष्ठ लिखते गए। एक नया विशाल ग्रंथ तैयार होने लगा और भारतीय ज्ञान के इतिहास में एक बड़ा काम हो गया।
'धर्मशास्त्र का इतिहास' का पहला खंड 1930 में प्रकाशित हुआ। केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया भर में पुरातन ज्ञान की नई हलचल मच गई। उनके ऐतिहासिक लेखन को हाथोंहाथ लिया गया। 'धर्मशास्त्र का इतिहास' के प्राक्क्थन में काणे ने स्वयं लिखा है, 'व्यवहारमयूख के संस्करण के लिए सामग्री संकलित करते समय मेरे ध्यान में आया कि जिस प्रकार मैंने 'साहित्यदर्पण' के संस्करण में प्राक्कथन के रूप में अलंकार साहित्य का इतिहास, नामक एक प्रकरण लिखा है, उसी पद्धति पर व्यवहारमयूख में भी एक प्रकरण संलग्न कर दूं, जो निश्चय ही धर्मशास्त्र के छात्रों के लिए पूर्ण लाभप्रद होगा। इस दृष्टि से जैसे-जैसे धर्मशास्त्र का अध्ययन करता गया। मुझे ऐसा दीख पड़ा कि सामग्री अत्यंत विस्तृत एवं विशिष्ट है, उसे एक संक्षिप्त परिचय में आबद्ध करने से उसका उचित निरूपण न हो सकेगा। साथ ही उसकी प्रचुरता के समुचित परिज्ञान, सामाजिक मान्यताओं के अध्ययन, तुलनात्मक विधि शास्त्र तथा अन्य विविध शास्त्रों के लिए उसकी जो महत्ता है, उसका भी अपेक्षित प्रतिपादन न हो सकेगा। निदान, मैंने यह निश्चय किया कि स्वतंत्र रूप से धर्मशास्त्र का एक इतिहास ही लिपिबद्ध करूं। आज धर्मशास्त्र का इतिहास एक ऐसी अनमोल थाती है, जिसमें वैदिक काल से आधुनिक काल तक के न केवल धर्म ग्रंथ बल्कि तमाम विधि-विधान, सामाजिक रीति रिवाज का भी पर्याप्त विवरण है।'
ज्ञान को फैलाया, समेटा नहीं -
काणे ने वही किया, जो एक विद्वान को करना चाहिए। जो सीखा, पढ़ा और अनुभव किया है, उसे दूसरों तक पहुंचाने का काम विद्वान करते हैं। वे एक युग से दूसरे युग के बीच ज्ञान सेतु का निर्माण करते हैं। बीती हुई पीढिय़ों का ज्ञान वर्तमान और भविष्य की पीढिय़ों तक पहुंचाने के लिए ज्ञान की धारा को प्रवाहित करते हैं। काणे के बारे में नि:संदेह कहना चाहिए कि ज्ञान का जैसा भव्य व विशाल सेतु उन्होंने बनाया, वैसा अन्यत्र नहीं मिलता।
आज विद्वान अपने ज्ञान को बांटने से हिचकने लगे हैं, लेकिन काणे उस ऋषि परंपरा के विद्वान थे, जिन्होंने खुले मन से अपने ज्ञान भंडार को लुटाया। उन्होंने 'धर्मशास्त्र का इतिहास' पहले अंग्रेजी में लिखा फिर संस्कृत व मराठी में। धर्मशास्त्र के इतिहास के एक के बाद एक पांच खंड प्रकाशित हुए। 1962 में पांचवां खंड आया। यह काम अद्भुत, उपयोगी और अतुलनीयहै कि भारत सरकार इसकी अनदेखी नहीं कर सकी। 1963 में उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारतरत्न दिया गया। बेहिचक कहना चाहिए कि काणे आज तक अकेले ऐसे 'भारतरत्न' हैं, जो शास्त्र चिंतन व संस्कृत को समर्पित रहे हैं।
आज जब संस्कृत भाषा को लगातार उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है, तब काणे को याद करना और याद रखना बहुत जरूरी है। 1930 में जब वे पचास साल के थे, तब धर्मशास्त्र का इतिहास का पहला खंड आया। जब अंतिम खंड आया, तब वे 82 वर्ष केे। उन्होंने पूरा जीवन धर्मशास्त्र के अध्ययन में समर्पित कर दिया। लगभग 6500 पृष्ठों के ऐतिहासिक ग्रंथ के अलावा भी उनके अनेक ग्रंथ प्रकाशित हुए। उत्तररामचरित से लेकर कादंबरी, हर्षचरित, हिंदुओं के रीतिरिवाज तथा आधुनिक विधि और संस्कृत काव्यशास्त्र का इतिहास उनकी कृतियां हैं। उनकी पुस्तकों के बिना आज कोई भी पुस्तकालय पूरा नहीं हो सकता। उनके द्वारा रचा गया ज्ञान कोश अंग्रेजी, संस्कृत और मराठी भाषा में 20000 से ज्यादा पृष्ठों में उपलब्ध है।
काणे ने 1972 में शरीर त्याग दिया, लेकिन जो अनमोल ज्ञान वे छोड़ गए हैं, उसका महत्व अपरिमित है। विद्वानों की दुनिया उन्हें भुला नहीं सकती। जब भी भारतीय संस्कृति को लेकर कोई विवाद उठता है तो काणे की रचनाओं से निकालकर उद्धरण दिए जाते हैं। उनकी कल्पना तार्किक थी। उन्होंने लिखा, 'भारतीय संविधान भारतीय संस्कृति के अनुरूप नहीं है, क्योंकि लोगों को अधिकार तो दिए गए हैं, लेकिन जिम्मेदारी नहीं दी गई।' आज कौन उनकी इस बात से इनकार करेगा? भारत में लोगों को हरसंभव अधिकार मिले हुए हैं, लेकिन लोग जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं हैं, जिससे समाज में अनेक चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। भारतरत्न डॉ. पांडुरंग वामन काणे के 141वें जन्मदिन पर उन्हें याद करना तभी सार्थक है, जब हम भारत और भारतीयता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझें।

