
'हम सबके ‘निराला' ~ निशान्त जैन' [निराला की पुण्यतिथि पर विशेष]
निराला के मेरा सबसे प्रिय कवि होने की कई वजहें हैं। राग-विराग के कवि निराला का पूरा जीवन और पूरा काव्य, ज़िंदगी के स्वाभाविक राग-विराग के वैविध्य से भरा है। निराला ने जो कुछ भी लिखा, पहले उसे जी भर कर जिया और फिर जी भर कर लिखा। 'जूही की कली' से लेकर 'सरोज स्मृति' और 'कुक़ुरमुत्ता' से लेकर 'राम की शक्ति पूजा' तक, इतना ग़ज़ब का वैविध्य, निराला की कविताओं में ही मिल सकता है। इसीलिए उन्हें 'विरूद्धों का सामंजस्य' करने वाला कवि कहा जाता है।
कबीर और गोरख की सी अक्खड़ता लिए निराला में, प्रसाद की उदात्तता, पंत का प्रेम और महादेवी की वेदना भी झलकते हैं, इसलिए वे छायावाद के प्रमुख स्तम्भ कहलाते तो हैं, पर मुझे लगता है कि निराला के विराट भावबोध को किसी युगविशेष या वाद-विशेष में बाँधना मुश्किल है।
उनमें परवर्ती युगों की प्रगति चेतना भी थी (‘कुकुरमुत्ता’, ‘बादल राग’, ‘वह तोड़ती पत्थर’ आदि कविताएँ) तो नए शिल्प और संवेदना दोनों स्तरों पर नए प्रयोगों की ललक भी (मुक्त छंद का प्रयोग)। इसीलिए निराला अपने काल को जीतने वाले होकर भी सर्वकालिक कवि बन जाते हैं।
