[Kavishala Opinion] यहाँ मैं अपनी एक कविता दे रहा हूँ., जिसका शीर्षक है 'कोई नहीं सुनाता आग के संस्मरण '। इस कविता की रचना का निश्चित समय तो याद नहीं किंतु यह तब लिखी गई थी जब हिंदी कविता ने अपना मुहावरा, अपनी भाषा और अपने रुख की दिशा बदली थी। उसका आक्रामक तेवर अब आत्मरक्षा में बदलने लगा था।। अपना खोया हुआ सब कुछ वापस छीन लेने के बजाय अब उसे जो शेष है उसे बचा लेने की फिक्र सताने लगी थी। उसे डर सताने लगा था कि शीघ्र ही हमारे पास जो है , छिन जाने वाला है।अतः जो बचा है उसे बचा लो और अब तक जो छिन चुका है , भूल जाओ। सत्ता , शासक वर्ग और शोषण पर टिकी पूँजीवादी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था पर आक्रमण अब उसका लक्ष्य न होकर , अपने ऊपर हो रहे आक्रमण के समय अपनी नाजुक चीजों को बचाना मात्र उसकी कथ्य-वस्तु , उसका अंतर्य हो गया था। क्रांति पृष्ठभूमि में चली गई थी। सर्वहारा समाजवादी क्रांति के द्वारा शोषण की , पूँजी को महत्व देने वाली व्यवस्था का अंत और एक नई श्रम को महत्व देने वाली व्यवस्था की स्थापना का स्वप्न देखना कविता ने बंद कर दिया था।
2006 में इसी कविता के नाम से मेरा दूसरा कविता-संग्रह " कोई नहीं सुनाता आग के संस्मरण " प्रकाशित हुआ जिसमें यह कविता भी शामिल है। किंतु इसके पू्र्व 2003 में यह कविता पहली बार 'अक्षर पर्व ' पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी थी। मुझे याद है, यह कविता तब लिखी गई थी जब वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण के नाम पर पूँजीवाद अपने जीवन की रक्षा के लिए दुनिया के कोने कोने , पृथ्वी के एक एक छिद्र में घुस कर आश्रय ढूँढ रहा था। अत्यंत मरणासन्न पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के नए रूप का यह उरोज काल था।पूँजीवादी राजनीतिक हमले ने उस समय किसी को नहीं छोड़ा था। कविता ही इस हमले से कैसे बच सकती थी?
कवियों ने भी पूँजीवादी सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक व्यवस्था में आए इस पतनशील परिवर्तन को नहीं समझा। इसके विपरीत कुछ कवि इसके स्वागत-गीत लिखने लगे। कुछ कवियों को बड़ी चालाकी और शातिराना ढंग से ग़लत दिशा में मोड़ दिया गया। ये कवि अब पूँजीवादी राजनीति और व्यवस्था का विरोध करने के बजाय पूँजीवादी वर्ग के हितों की रक्षा में तैनात पूँजीवादी जनतांत्रिक राजनीति तक ही सीमित रह गए। उनकी दृष्टि सत्ता में बैठे राज नेताओं तक जाकर उनके विरोध पर ख़त्म हो जाने लगी। सर्वहारा समाजवादी क्रांति के द्वारा पूँजीवादी व्यवस्था को उन्मूलित कर एक नई समाजवादी व्यवस्था की स्थापना के बजाय वे अब पूँजीवादी जनतंत्र की रक्षा तक ही सोचते थे। वे अब क्रांति नहीं संशोधन और वर्तमान व्यवस्था में ही सुधार की बात करने लगे। व्यवस्था के जड़ से उन्मूलन की नहीं , जो कुछ बचाया जा सके, उसे ही बचाने की बात करने लगे । इस तरह हिंदी कविता की आग और उसकी आँच ग़ायब हो गई। उसका स्थान कोमल चीजों ने ले ली। हाँ , कुछ कवि नारी और दलित उत्पीड़न पर भी कविताएं लिख रहे थे , किंतु उनका भी लक्ष्य पूँजीवादी व्यवस्था का अंत नहीं , पूँजीवादी व्यवस्था के अंदर ही , उसे अक्षुण्ण रखकर , उनकी स्थिति में सुधार था।
उधर पूँजीवाद का हमला हर प्रकार की कोमलता पर होता रहा , कवि उस कोमलता को बचाने में लगे रहे। कविता संरक्षणात्मक हो गई। उसकी आक्रमण-शक्ति नदारद हो गई। अब कविता का लक्ष्य व्यवस्था में परिवर्तन नहीं सत्ता में काबिज नेताओं में बदलाव लाना हो गया। पूँजीवादी जनतंत्र को उखाड़ फेंकने के बजाय उसकी रक्षा हो गया। किंतु मूलतः यह कविता का नहीं , भारत की वामपंथी विचारधारा और राजनीति का संकट था , जिसने कविता को पथभ्रष्ट कर दिया था।
कविता पढ़िए--
कोई नहीं सुनाता आग के संस्मरण
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आग बहुत पहले बुझ चुकी है
सिर्फ़ धुआँ उठ रहा है गीली लकड़ियों से
राख अब छोड़ने लगी है कोयले का साथ
इस ख़बर से सबसे ज्यादा दुखी एक बुढ़िया थी
बड़ी देर से वह ढिबरी लिए बैठी थी
हलवाई भी पहले पहल बहुत ग़मगीन हुआ
पर वह जल्दी ही भूल गया सब कुछ
बदल लिया उसने अपना रोज़गार
और भी कई लोग थे जो उदास हुए थे
जैसे अख़बारों में छपी किसी बड़ी दुर्घटना पर होते हैं
फिर वे
व्यस्त हो गए थे अपने अपने काम में
कुछ लोग ऐसे भी थे जो
न बुढ़िया की तरह दुखी हो सकते थे
न बदल सकते थे हलवाई की तरह अपना रोज़गार
वे आग की उम्मीद से इस तरह प्रतिबद्ध थे
कि निस्पृह भी नहीं रह सकते थे तमाम लोगों की तरह
सबसे अधिक संकट उनके लिए था
वे पढ़े-लिखे थे
बुद्धिजीवी कहलाना उन्हें अच्छा लगता था
लिहाज़ा वे जल्दबाज़ी में नहीं व्यक्त कर सकते थे
कोई चलताऊ प्रतिक्रिया
वे पहले पाषाण सरीखे हतप्रभ हुए
फिर दहाडें मार कर ढह पड़े
फिर जैसे सचेत हो
जल्दी-जल्दी बतियाने लगे आपस में
ऊँची-ऊँची आवाज़ों में --
बुझी नहीं है आग
आग कभी बुझ ही नहीं सकती
देखो वहाँ अभी भी उठ रहा है धुआँ !
इस गंभीर वार्ता के पश्चात वे
धूनी रमा कर बैठ गए।
हवा गर्म थी , खासी गहमागहमी थी
जितने लोग थे
उससे अधिक अटकलें थीं
जो समझदार थे , पहचानते थे समय की नब्ज़
एक लफ़्ज नहीं बोले वे
आग के बारे में
ये वही लोग थे
जिन्होंने कभी
पूरी दुनिया में
आग जलाने के ख़्वाब देखे थे
हालांकि जारी नहीं हुआ कोई अध्यादेश
आपातकाल की घोषणा नहीं की गई , किंतु
अब आग एक संवेदनशील मुद्दा था
बहुत ख़तरनाक था अब आग के बारे में बोलना
सोचना तो और भी जोख़िम भरा काम था
अब कुछ भी बोलना
आग के बारे में
अपनी ही कलई खोलना था
सबसे बुरा हाल कवियों का था
कुछ तो भाग कर छिप गए औरतों के पीछे
कुछ आग को छोड़
फूल और चिड़िया और नदी और पहाड़ बचाने लगे
कुछ लगाने लगे अपने घरों में गोते
भूलकर भी कोई नहीं लेता आग का नाम
आग जो हर जगह मौज़ूद है और
जो बझी थी वह आग नहीं
आग की अफवाह थी
धीरे-धीरे बासी होने लगीं आग की स्मृतियाँ
आग के बारे में कोई नहीं सुनाता अपने संस्मरण
कोई पलटकर नहीं देखता उन अग्निखोरों को
आग लगातार बहा करती है जिनकी धमनियों में
आँखों में चिनगारियाँ जहाँ पहले से ज्यादा निकलती हैं
धुएँ के घटाटोप बवंडरों के बीच
अहर्निश दहकती हैं जहाँ भट्ठियाँ
इस बीच वे
जो दमकलों की दुकानें लेकर बैठे थे
शटर गिराकर वापस चले गए हैं राजपथ पर
टल गया है
हमेशा के लिए
दुनिया से
आग का ख़तरा !
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