
मेरी एक कविता जो हर वर्ष के अंतिम दिन ज़रूर याद आती है - शैलेश लोढ़ा
वो कल भी भूखा सोया था फुटपाथ में
अचानक खूब पटाखे चले रात में
झूमते चिल्लाते नाचते लोगों को देखा तो हर्षाया
पास बैठी ठिठुरती मां के पास आया
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मेरी एक कविता जो हर वर्ष के अंतिम दिन ज़रूर याद आती है - शैलेश लोढ़ा
वो कल भी भूखा सोया था फुटपाथ में
अचानक खूब पटाखे चले रात में
झूमते चिल्लाते नाचते लोगों को देखा तो हर्षाया
पास बैठी ठिठुरती मां के पास आया