इक रात वो गया था जहाँ बात रोक के 

अब तक रुका हुआ हूँ वहीं रात रोक के 


फ़रहत एहसास

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इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई 

हम न सोए रात थक कर सो गई 


राही मासूम रज़ा

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रात तो वक़्त की पाबंद है ढल जाएगी 

देखना ये है चराग़ों का सफ़र कितना है 


वसीम बरेलवी

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कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई 

आओ कहीं शराब पिएँ रात हो गई 


निदा फ़ाज़ली

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बहुत दिनों में मोहब्बत को ये हुआ मा'लूम 

जो तेरे हिज्र में गुज़री वो रात रात हुई 


फ़िराक़ गोरखपुरी

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ये सर्द रात ये आवारगी ये नींद का बोझ 

हम अपने शहर में होते तो घर चले जाते 


उम्मीद फ़ाज़ली

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हर एक रात को महताब देखने के लिए 

मैं जागता हूँ तिरा ख़्वाब देखने के लिए 


अज़हर इनायती

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मिरी नज़र में वही मोहनी सी मूरत है 

ये रात हिज्र की है फिर भी ख़ूब-सूरत है


ख़लील-उर-रहमान आज़मी

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पहले नहाई ओस में फिर आँसुओं में रात 

यूँ बूँद बूँद उतरी हमारे घरों में रात 


शहरयार

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चाँद भी निकला सितारे भी बराबर निकले 

मुझ से अच्छे तो शब-ए-ग़म के मुक़द्दर निकले 


अहमद मुश्ताक़

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उम्र भर की तल्ख़ बेदारी का सामाँ हो गईं 

हाए वो रातें कि जो ख़्वाब-ए-परेशाँ हो गईं 


अख़्तर शीरानी

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रात आ कर गुज़र भी जाती है

इक हमारी सहर नहीं होती


-इब्न-ए-इंशा

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हर तरफ़ थी ख़ामोशी और ऐसी ख़ामोशी 

रात अपने साए से हम भी डर के रोए थे 

- भारत भूषण पन्त

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वो कह के चले इतनी मुलाक़ात बहुत है 

मैंने कहा रुक जाओ अभी रात बहुत है

-अज्ञात

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अभी रात कुछ है बाक़ी न उठा नक़ाब साक़ी 

तेरा रिंद गिरते गिरते कहीं फिर सँभल न जाए 

- अनवर मिर्ज़ापुरी

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यह सोच कर सब को याद कर के सोते है हम,

पता नहीं ज़िन्दगी मैं कौन सी रात आखरी हो

-अज्ञात

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हम तो रात का मतलब समझें ख़्वाब, सितारे, चाँद, चराग़ 

आगे का अहवाल वो जाने जिस ने रात गुज़ारी हो 

- इरफ़ान सिद्दीक़ी

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फिर कभी न आऊँगी तुम्हारी ज़िन्दगी में लौट के 

सारी ज़िन्दगी तन्हाई के लिए , आज की रात बहुत है

-अज्ञात

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आज न जाने राज़ ये क्या है 

हिज्र की रात और इतनी रौशन 

-जिगर मुरादाबादी

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मेरी आँखों में छुपी उदासी को महसूस तो कर

हम वह हैं जो सब को हंसा कर रात भर रोते हैं

-अज्ञात

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मैं नज़र से पी रहा हूँ ये समाँ बदल न जाए 

न झुकाओ तुम निगाहें कहीं रात ढल न जाए 

- अनवर मिर्ज़ापुरी