कविताओं से अलग प्रेम रखते है प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी, आइये पढ़तेहै उनकी कुछ कविताएं:
समीसांजनी वेणा: आपणे रमताराम अकेला
मारा आ तमनममां उभरे तरणेतरना मेणा
कोई पासे नहीं लेवुंदेवुं: कदी होय नहीं मारुंन्तारुं
आ दुनियामां जे कैं छे के मनगमतुं मणियारुं
रस्तो मारो सीधोसाधो: नहीं भीड़: नहीं ठेलमठेला
समीसांजनी वेणा: आपणे रमताराम अकेला
कोई पंथ नहीं: नहीं संप्रदाय: माणस ऐ तो माणस,
अजवाणामां फरक पड़े शुं? कोडियुं हय के फानस
झणांझणां झुम्भरनी जेवां क्यारेच नहीं लटकेला
समीसांजनी वेणा: आपणे रमताराम अकेला
[नरेन्द्र मोदी]
स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री मोदी लाल किले से देश को संबोधित करते हैं उनके भाषण में कई ख़ास बातों के साथ एक बात यह भी रही कि उन्होंने अपने भाषण की समाप्ति एक कविता के साथ की थी:
अपने मन में एक लक्ष्य लिए
मंज़िल अपनी प्रत्यक्ष लिए
हम तोड़ रहे हैं जंजीरें
हम बदल रहे हैं तस्वीरें
ये नवयुग है, नव भारत है
खुद लिखेंगे अपनी तकदीरें
हम निकल पड़े हैं प्रण करके
अपना तन-मन अर्पण करके
जिद है एक सूर्य उगाना है
अम्बर से ऊँचा जाना है
एक भारत नया बनाना है
एक भारत नया बनाना है
जब नरेन्द्र मोदी में लंदन के दौरे पर थे वहां उन्होंने वेस्टमिंस्टर सेंट्रल हॉल में 'भारत की बात, सबके साथ' कार्यक्रम में भारतीय समुदाय के लोगों को संबोधित किया था। इस कार्यक्रम में पीएम ने लोगों के सवालों के जवाब दिए और अपनी कई अहम बातें लोगों के साथ साझा कीं। इसी कार्यक्रम में उन्होंने अपनी लिखी एक कविता 'रमता राम अकेला' भी सुनाई, उसी कविता को प्रधानमंत्री ने ट्विटर पर भी साझा किया था। यह कविता गुजराती में लिखी गयी है।
समीसांजनी वेणा: आपणे रमताराम अकेला
मारा आ तमनममां उभरे तरणेतरना मेणा
कोई पासे नहीं लेवुंदेवुं: कदी होय नहीं मारुंन्तारुं
आ दुनियामां जे कैं छे के मनगमतुं मणियारुं
रस्तो मारो सीधोसाधो: नहीं भीड़: नहीं ठेलमठेला
समीसांजनी वेणा: आपणे रमताराम अकेला
कोई पंथ नहीं: नहीं संप्रदाय: माणस ऐ तो माणस,
अजवाणामां फरक पड़े शुं? कोडियुं हय के फानस
झणांझणां झुम्भरनी जेवां क्यारेच नहीं लटकेला
समीसांजनी वेणा: आपणे रमताराम अकेला
निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल संसद में पढ़ी | प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी बात को रखने के लिए शायर निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल संसद में पढ़ी।
सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो
इधर उधर कई मंज़िल हैं चल सको तो चलो
बने बनाये हैं साँचे जो ढल सको तो चलो
किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो
यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
मुझे गिराके अगर तुम सम्भल सको तो चलो
यही है ज़िन्दगी कुछ ख़्वाब चन्द उम्मीदें
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो
हर इक सफ़र को है महफ़ूस रास्तों की तलाश
हिफ़ाज़तों की रिवायत बदल सको तो चलो
कहीं नहीं कोई सूरज, धुआँ धुआँ है फ़िज़ा
ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो

