फिर पुराने नीम के नीचे खड़ा हूँ

फिर पिता कि याद आई है मुझे

नीम सी यादें सहज मन में समेटे,

चारपायी डाल आँगन बीच लेटे,

सोचे हैं हित सदा उन के घरों का,

दूर हैं जो एक बेटी, चार बेटे

फिर कोई रख हाथ काँधे पर,

कहीं यह पूछता है,

"क्यूँ अकेला हूँ भरी इस भीड़ में ?"

मैं रो पड़ा हूँ

फिर पिता कि याद आई है मुझे

फिर पुराने नीम के नीचे खडा हूँ

[कुमार विश्वास]


घर की बुनियादें दीवारें बाम-ओ-दर थे बाबू जी 

सब को बाँध के रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी 

तीन मोहल्लों में उन जैसी क़द काठी का कोई न था 

अच्छे-ख़ासे ऊँचे पूरे क़द-आवर थे बाबू जी 

अब तो उस सूने माथे पर कोरे-पन की चादर है 

अम्मा जी की सारी सज-धज सब ज़ेवर थे बाबू जी 

भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता 

अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी 

कभी बड़ा सा हाथ-ख़र्च थे कभी हथेली की सूजन 

मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबू जी

[आलोक श्रीवास्तव]


बुखार वाली रातें...

हमारी फिक्र में सिर्फ मां थोड़ी जागतीं थीं

कच्ची नींद में सोते तो पापा भी थे..

किसी की नज़र नहीं गई..

लेकिन रोते तो पापा भी थे।

[मनोज मुंतशिर]




अभी भी

भटकाती हैं जब जीवन की अँधेरी गलियाँ

दूर कहीं अनंत से देखती आपकी आँखें

रास्ता दिखाती हैं मंज़िल का/


पिता

मेरे हिस्से का सूरज तो आप थे/

उस रात चले भी गये अस्ताचल की ओट

तो लौटकर क्यों नहीं आए अगली सुबह?

[अतुल कनक]


बाप बाप होता है

पर यह तभी पता चलता है

जब वो नहीं होता है

जब किसी का डर नहीं रहता

जब खुल के पी सकें दारू

और सिगरेट तो ऐसे जैसे साँस

कोई रोकने वाला नहीं

टोकने वाला नहीं

बाप का घर अब अपना है

अटरिया वाला पूजा घर तोड़ के

दूसरी मंज़िल बनाने का सपना है।

[विवेक रंजन अग्निहोत्री]



पिता की संज्ञा से प्रतिबद्ध

मैं सदा ही नितांत गम्भीर रहा

तुम्हारे दुःख से कितना दुखी था

पर मैंने कुछ भी न कहा

मेरा काम ही परिवार में दरख़्त की तरह

सख़्ती से..बिना हिले खड़े रहना है

तुम पर कोई भी दुख पड़े

उससे पहले उसे मुझे ही सहना है

[प्रियंका]