"हर चीज़ सुलझाई जा सकती है. मृत्यु को छोड़कर.”
अभी तक अपने सफ़र में मैं तेज़-मंद गति से चलता चला जा रहा था. मेरे साथ मेरी योजनाएं, आकांक्षाएं, सपने और मंज़िलें थीं. मैं इनमें लीन बढ़ा जा रहा था कि अचानक टीसी ने पीठ पर टैप किया, ”आपका स्टेशन आ रहा है, प्लीज़ उतर जाएंमेरी समझ में नहीं आया, ”ना ना, मेरा स्टेशन अभी नहीं आया है.”
जवाब मिला, ”अगले किसी भी स्टॉप पर आपको उतरना होगा. आपका गन्तव्य आ गया.”
इरफ़ान एक जगह कहते हैं,”मैं दर्द की गिरफ्त में हूं.”
”पहली बार मुझे शब्द ‘आज़ादी’ का एहसास हुआ, सही अर्थ में! एक उपलब्धि का एहसास…इस कायनात की करनी में मेरा विश्वास ही पूरी तरह सत्य बन गया. उसके बाद लगा कि वह विश्वास मेरे हर सेल में पैठ गया. वक़्त ही बताएगा कि वह ठहरता है कि नहीं! फ़िलहाल मैं यही महसूस कर रहा हूं.”
‘आदतन तो सोचेंगे, होता यूं तो क्या होता मगर जाने दें…’
अजय ब्रह्मात्मज बताते हैं:
"इरफान को अपनी हर फिल्म के किरदार का नाम याद होता था, कितनी भी पुरानी फिल्म का चित्र दिखाकर उसके बारे में हर एक पहलू इरफान आसानी से बता देते थे! कविशाला संवाद में बात करते हुए अजय ब्रह्मात्मज ने बताया की इरफान ने सुशांत को उसके पहली फिल्म पर बधाई देते हुए कहा था "बहुत अच्छा काम किया है, संभलकर आगे बढ़े तो बहुत अच्छा आगे जायेगा!" अजय ब्रह्मात्मज खुद शुशांत के साथ घंटो बैठे थे जब शुशांत धोनी फिल्म के बाद परेशान थे!
अजय बताते हैं की फ़िल्मी दुनिया सब कुछ देती है मगर 'कान' और 'कन्धा' नहीं देती है!
उत्तर भारतीय प्रतिभा को हमेशा उंगली दी है अजय ब्रह्मात्मज ने, उन्हें आगे बढ़ने में जिस तरह से सहायता हो सकती, उसको सहायता पहुंचाने की कोशिश की है !
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