नजरा गइली गुईयाँ [कहानी] - गीताश्री's image
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नजरा गइली गुईयाँ [कहानी] - गीताश्री

बाबू सर्दी के भोरे भोरे औंघाते हुए, ऊबासी लेते हुए, पतली ऊनी चादर देह से लपेटते हुए बरामदे पर चले आ रहे थे। कोई उनके नाम का हांक दे रहा था। कौन हो सकता है जो उन्हें पूरे नाम से पुकारे....यह सधी हुई पुकार थी, देसी नहीं।

“पमपम तिवारी...पमपम तिवारी जी...”

घर में कोई और हो तो न हांक सुन कर बाहर जाए। अकेली जान और उनकी देख रेख करने वाला टुअर ललुआ । जाने कौन जन्म का संबंध निबाह रहा है। आया तो था, शागिर्द बनने, सेवक बन कर रह गया। न वे सिखा सके, न वो सीख सका। उनके बेटे, बहू छोड़ कर चले गए, पिता के पेशे से बैर जो ठहरा। ललुआ न जा सका। उनका हमदम, हमराज और बचेखुचे खपरैल मकान का मालिक। खेतों में कमाता और दोनों का खर्च चलाता। मस्त रहता और पमपम बाबू से पुराने दिनों के किस्से सुनता। यही उसका एकमात्र मनोरंजन का साधन था।

अजनबी हांक सुन कर पमपम बाबू बाहर निकले। ललुआ पोखरी की तरफ निकल गया होगा। बहुत दिनों से कोई पूरा नाम लेकर नहीं पुकारा था। अपने टोले में पमपम बाबू के नाम से जाने जाते थे।

“अवइछी...अवइत हती...” सुर में गाते हुए वे बाहर आए। आंखें मींचते हुए एक अनजान युवक पर नजर पड़ी।

“इस देस का तो नहीं लग रहा प्राणी...” उनींदी आंखें फक से खुल गईं।  

“आप ही हैं न, पमपम बाबू, इस इलाके के सबसे मशहूर हकपड़वा। मैं मुजफ्फरपुर से आया हूं, आपको मेरे साथ चलना है, वहां आपकी कला की हमें जरुरत है। आपकी जो डिमांड हो, बता दीजिए...”

सामने खड़े युवक को पमपम बाबू ने अजीब नजरों से घूरा। ललुआ हाथ में बांस का दतुअन और लोटा भर पानी लेकर खड़ा हो गया था।

“कौन भेजा आपको यहां ?” वो बताया नहीं कि हम ये काम छोड़ दिए हैं, और किसी को जरुरत भी नहीं हमारी,  हमारा बुढ़ापा आ गया है, हमसे नहीं होता है ये सब, हम नहीं जाएंगे कहीं, माफ करिए.”

दोनों हाथ जोड़ कर वे पलट गए थे। गले में रेत-सा फंसता हुआ महसूस हुआ।

“आखिरी बार चलिए...आपके बिना संभव नहीं । कल ही तेरहवीं है, और कल ही आपकी जरुरत है।“

“ललुआ बोल दे उनको, हम नहीं करते ये काम...”

“मालिक नहीं जाएंगे, आप लौट जाइए...कैसे पता चला आपको...कौन भेजा...ईहां तो किसी को पता नहीं कि हमारा पुश्तैनी धंधा क्या था?”

ललुआ हैरान हुआ।

युवक ने अपनी जेब से एक पर्ची निकाली और ललुआ को बोला- “अपने मालिक को पढ़वा दीजिए।“

ललुआ हैरान होता हुआ पर्ची लिया खुद तो पढ़ न सका। पढ़ता कैसे, एलएलपीपी यानी लिख लोढ़ा पढ़ पत्थर जो था। सीधे पमपम बाबू के आगे जाकर पर्ची थमा दिया।  

पर्ची पढ़ते ही उनके चेहरे का रंग उड़ गया। गोरा चेहरा तपने लगा था। चेहरे की झुर्रिया कांपने लगी थीं। वे मुट्ठी में उस कागज को दबाए दबाए आंगन की तरफ चले गए। ललुआ ने नोटिस किया, पैरों में जान नहीं बची थी। चलते हुए लहरा रहे थे। अपने आपे में नहीं थे। बाहर खड़ा युवक प्लास्टिक वाली कुर्सी खींच कर इत्मीनान से बैठ गया था। उसे उम्मीद थी कि यहां से वह विफल हो कर नहीं लौटेगा।

......



फरवरी का पहला सप्ताह था जिसमें ठंढ़क अभी तक टिकी हुई थी। रिया को दिन भर नामालूम-सी बेचैनियां रहीं, शाम को भतीजे ने आई सी यू से एक 50 सेंकेंड का विडीयो क्लिपिंग भेजा। गहन चिकित्सा कक्ष में मां अंतिम सांसे ले रही थीं। पटना जाने वाली फ्लाइट सुबह ही मिलती। सबसे पहली फ्लाइट बुक की। अंतिम समय में मां के पास होना चाहती थी। एयरपोर्ट पर बैठे बैठे बार बार वीडियों क्लिपिंग देखती और रोती जाती। किसी तरह मां से एक बार जीते जी मिल ले। डेढ़ घंटे बाद जब पटना एयरपोर्ट पर उतरी तो कहानी बदल चुकी थी। अनगिनत फोन कॉल्स और मैसेज से मोबाइल भरा हुआ था।

मां नही रही...

पिता के जाने के बाद मां ही उसका घर थीं। सबसे छोटी और इकलौती बेटी होने के नाते मां का उस पर खासा दुलार था। मां अपने हर फैसले के लिए रिया पर निर्भर थीं। रिया को लेकर बदनाम थीं कि उससे पूछे बिना कोई काम नहीं करतीं। न ही अपनी चीजों को किसी को हाथ लगाने देती। बहुत गोपनीयता बरतने वाली स्त्री थी मां। हर चीज सहेज कर, संभाल कर, सबकी पहुंच से दूर रखतीं। रिया ने कभी उन चीजों में दिलचस्पी नहीं ली। मां का सिरहाना तो पूरा बक्सा जैसा था। सारी चीजें रखतीं, कागज पत्र, चाबियां, बीड़ी, माचिस जाने क्या क्या...। शहर में रहने के वाबजूद मां की आदते नहीं बदली थीं. उनके आंचल में रुपये, सिक्के जरुर बंधे मिलते। रिया उन्हें खोलती और मजे मजे में वे पैसे लूट लेती। रिया के अलावा कोई और नहीं कर सकता था ऐसा। वे पूरे परिवार से एक दूरी बनाकर जीती थीं। उन तक पहुंचने का उचित माध्यम रिया थी। मुजफ्फरपुर से कोसो दूर, अपनी एकल जिंदगी में मस्त। दोनों भाईयों के सामंती रवैया से तंग आकर विद्रोह बन जाने वाली रिया ने सिर्फ मां से बातचीत रखी और भाइयों से बोलचाल बंद। भाभियां कभी कभार मुस्कुरा देतीं। रिया बदले में आत्मीय मुस्कान दे देती, ये जानते हुए कि गुलाम आत्माओं का कोई कसूर नहीं होता। पराधीनता में सिर्फ मुस्कुरा पड़ना ही सबसे आसान क्रिया है। मां ने भी कभी दबाव नहीं डाला। वे सुख चैन चाहती थीं। रिया को पूरा समर्थन देती थीं और दोनों बेटो के परिवार से अलग घर की ऊपरी मंजिल पर रहती थीं। पिता के जाने के बाद मां ने पहली मंजिल पर अपना ठिकाना बना लिया था। जिसे मिलना हो, कुछ चाहिए, वो आए उपर। गठिया की वजह से बिस्तर पकड़ चुकी थी। देखरेख के लिए गुलिया चौबीसो घंटे उनके पास रहती थी। रिया एकदम निश्चिंत थी मां की तरफ से। मां भी निश्चिंत थीं बेटी के फैसले से। रिया पर पूरा भरोसा था और ये भी इत्मीनान था कि अपनी जिंदगी के फैसले बेहतर करेगी। चाहे शादी करे न करे, वो शादी थोपे जाने के खिलाफ थीं। रिया से फोन पर पूछती रहती थीं- “कोई पसंद आया...तेरी इज्जत करेगा ना, साथ देगा न...तुझ पर शासन तो नहीं करेगा..? .देख लेना..ठोक बजा कर...पहले कागज पर लिखवा लेना...”

“अरे मां...ऐसे कहीं प्यार होता है जिसमें कंडीशन अप्लाई हो...बोलो....अभी मेरा मन नहीं...क्या उम्र मेरी, 36 साल की तो हूं...हो जाएगी..होनी होगी तो...ना हो तो भी हम कौन सा मरे जा रहे...अकेली लाइफ ज्यादा मस्त...न कोई रोकने वाला, न टोकने वाला...जह जहां मन हो, उठ कर चल देती हूं...किसी को जवाब नहीं देना पड़ता मां...यहां कोई मेरी जिंदगी में नहीं झांकता...”   

“अच्छा मां, एक बात बताओ...तुम भी टिपिकल मदर की तरह मेरी शादी का सपना देखती हो क्या...?”

रिया मां को कुरेदती।

“भक्क...हम ऐसा सपना देखते तो तुम आज वहां से हमसे मजाक कर रही होती का..दो तीन बच्चा-खच्चा लेकर किचकिचा रही होती...हम वैसी मां नहीं, हम तो तुमको पैर पर खड़ा होते देखने का सपना देखते रहे, खुदमुख्तार बनने का सपना...मेरी तरह नहीं बनाना चाहती थी कि दिन भर टेटियाती रहो- “ऐ जी...सुनते हैं, हमको सौ रुपया दीजिए...हमको चूड़ी खरीदना है...”

मां एक्टिंग करतीं, आवाज बदल लेतीं...और फिर दोनों मां बेटी फोन पर हंसती रहती देर तक। मां का यही अगाध विश्वास उसकी पूंजी था जिसके सहारे वह भाइयों का बंधन काट कर दिल्ली पहुंच गई थी। जहां अपनी दुनिया का विस्तार कर रही थी और अपना समाज बना रही थी।

मां के नहीं रहने की खबर ने उसे बुरी तरह झकझोर दिया था। वह सचमुच तन्हा हो गई थी। घर के बाहर भारी भीड़, रिश्तेदारों का खोखला विलाप और मां की ठंडी देह ने उसे भीतर से तोड़ दिया। भाभियों ने उसे संभाला। नहीं तो मां की देह पर भरभरा कर गिर गई होती। इस शहर से नाता हमेशा के लिए टूट गया था। एक कड़ी थी मां, जो टूट गई। तेरह दिन बाद सदा के लिए इस शहर को अलविदा कह देना है। मुड़ कर न देखना है। मां को लोग मंजिल की तरफ ले गए थे। द्वार पर सन्नाटा छा गया था।

मां के बेड पर जाकर गिर पड़ी। बाहों में चादर भींज कर लोटती रही देर तक। भाभियों से पूछती रही- “मां ने कुछ कहा क्या..अंतिम समय क्या बोलीं...मेरे लिए कुछ कहा...मेरा नाम लिया..कैसे हुआ.”

बड़ी भाभी चुपचाप उठ कर चली गईं। छोटी भाभी ने हौले से कहा- “उन्होंने मौका ही कहा दिया, ब्रेन हेमरेज हुआ तो जल्दी होस्पीटलाइज कराना पड़ा। सबलोग उसी में लग गए, कोई उनसे बात नहीं कर सका, वो कुछ कहना चाहती थीं, मगर आईसी यू में बात नहीं करने देता है न, उनके ए टी एम का पासवर्ड तक न पूछ पाए, अभी कामकाज में पैसा लगेगा, निकालना पड़ेगा, किसी को कुछ बताती थोड़े थीं ”

भाभी के लहजे में उदासी कम, शिकायत ज्यादा थी।

“मां जी आपसे तो ज्यादा बात करती थीं, आपको पता होगा ? आपसे बताई होंगी अपनी इच्छा ”

भाभी के स्वर में उलाहना था। रिया चुपचाप सुबकती रही। मां के तकिया पर सिर रख कर सो गई। भाभी कब उठ कर चली गई, पता न चला। देर रात सब मंजिल से लौटे, घर में विधि विधान होता रहा, रिया को किसी ने नहीं जगाया। गुलिया पलंग के नीचे सो गई थी।

सुबह कुछ बदली हुई थी। भाइयों के चेहरे पर अवसाद की जगह थकान की छाया थी। भाभियां काम करके हलकान हो गई थीं और बड़ी भाभी का बड़बड़ाना शुरु था। गांव के कुछ रिश्तेदार डेरा डाल चुके थे। कुछ तो तेरह दिन तक हिलने वाले नहीं थे। छोटा भाई कर्ता बना था, इसलिए वह एक कमरे में शांत पड़ा था। बड़े भइया बहुत एक्टिव थे। सारा उन्हें संभालना था। रिया से दोनों भाइयों का अबोला-सा था।

द्वार पर सब बैठे थे, रिया को बड़ी भाभी ने ही टोका-

“आप मां के पैसों के बारे में जानती हैं। जमीन का कागज पत्तर कहां रखा है, ये भी हम लोगो को नहीं मालूम, आपको तो जरुर बताई होंगी..”

“पैसा निकालना है, आज से तेरह दिन काम ही काम, दो दिन का भोज होगा और मांगने वाले भी आएंगे...दान भी करना पड़ेगा...खर्चा तो बहुत होगा...बजट बनाना होगा..पहले पैसे का पता चले, फिर उसी हिसाब से तय होगा।“

बड़े भैया की आवाज में गहरी चिंता थी। दुख का साया कहीं नहीं दिखा। रिया को सारा माजरा समझ में आ गया था। उसका मन हुआ, तेरह दिन न रुके, मां तो चली गई, तेरह दिन की क्रिया बेमानी है, इसे क्यों करना, भोज भी न हो।

उसने अपनी इच्छा जाहिर कर दी। सुनते ही घर में बम फटा। बड़े बैया जोर से चिल्लाये- “हमारी समाज में कोई इज्जत है कि नहीं, हम कंगले हैं क्या ? हम जो दूसरो का भोज खाते रहते है, हम उनको क्या कहेंगे, समाज को क्या मुंह दिखाएंगे। हम जो इतना चुमावन (रुपये) दिए हैं शहर भर में, उसको वसूलने का समय अब आया है, हम कैसे छोड़ दे। तुमको तो दिल्ली चले जाना है। हम लोगो को इसी समाज में रहना है. जिसको जाना हो जाए, हम लोग कर लेंगे सब काम. कल ही बैंक से बात करेंगे. बाबू जी का पेंशन मां के अकाउंट में जमा होता था, चार पांच लाख होगा उसमें. इतना खर्च तो होगा ही.”

रिया उठी और चुपचाप पहली मंजिल पर मां के कमरे में चली गई। भाई के फट पड़ने के बाद  उनका संकेत समझ गई थी कि वे नहीं चाहते थे रिया यहां रुके या कोई दखल दे। मां का पैसा किसी तरह रिया उन्हें सौंप दे। बड़ी भाभी सिरहाने आकर खड़ी हो गई थीं।

“मां का बक्सा काहे नहीं चेक करती हैं ? .रुम में ही रखा होगा न कहीं, आराम से ढूंढिए, मिल जाएगा. वैसे भी मां का रुम , आप ही चेक करिए, हम लोग नहीं छुएंगे कुछ, कलंक लग जाएगा.”

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