हम भी देखेंगे अब हॉकी, घर से निकले काका-काकी।


लेकर संग में चाय, मिठाई, हलवा, पूरी और मलाई,

कपड़े पहने खाकी-खाकी, संग में नौकर चला बुलाकी।


हुआ भीड़ में धक्कम-धक्का, घुसकर बैठे कक्की-कक्का,

हम देखेंगे पहले हॉकी, सब करते थे ताका-झाँकी।


एक अगाड़ी, एक पिछाड़ी, दौड़ रहे थे सभी खिलाड़ी,

गेंद संग चलती थी हॉकी, दिखा रहे थे सब चालाकी।


हुआ गोल तब उछले काका, छुटे पटाखे, धूम-धड़ाका,

आँख मूँदकर बैठीं काकी, मारे डर गिर पड़ा बुलाकी।


रुका खेल मध्यान्तर आया, नौकर से जलपान मँगाया,

खाते-पीते काका-काकी, चीज़ न कोई छोड़ी बाक़ी।


मैच हो गया ड्रा, इठलाते, लौटे काका, हँसते-गाते,

ख़ुश थे काकी और बुलाकी, बड़े मज़े की होती हॉकी।