भूक चेहरों पे लिए चाँद से प्यारे बच्चे
बेचते फिरते हैं गलियों में ग़ुबारे बच्चे
बेदिल हैदरी का शेर ये बाल श्रम की वीभत्सता को बड़े ही सटीक तरीके से दर्शाता है. पूरी दुनिया में करोडो बच्चे बाल मजदूरी का दंश झेलने को मजबूर हैं. हालाँकि भारत में बाल श्रम को लेकर स्पष्ट आंकड़े मौजूद नहीं हैं। लेकिन, वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 5-14 आयु वर्ग के एक करोड़ से भी ज्यादा बच्चों ने अपनी इच्छा या मज़बूरी से बाल श्रम चुना है .बाल श्रम पर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में लगभग 15.2 करोड़ बच्चे बाल श्रम के लिए मजबूर हैं!
बाल श्रम के विरोध में आज यानि 12 जून को पूरी दुनिया एंटी चाइल्ड लेबर डे मनाती है. एंटी चाइल्ड लेबर डे की शुरुआत साल 2002 में 14 साल से कम उम्र के बच्चों को बाल मजदूरी से निकालकर शिक्षा दिलाने के उद्देश्य से 'द इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन' ने की थी। हालाँकि आज इस मुहीम (एंटी चाइल्ड लेबर डे) को 18 साल हो चुके हैं फिर भी भारत में बाल मजदूरी पर लगाम कस पाना मुश्किल लग रहा है!
एक सभ्य समाज के लिए बाल मजदूरी एक चुनौती है, जहाँ बच्चो के हाथ में किताब की जगह होटल के जूठें बर्तन हो, जहाँ बच्चों की आँखों में सुनहले ख्वाबों की जगह लाचारी झलके उस जगह को आखिर सभ्य समाज कैसे कहा जा सकता? बाल मजदूरी के लिए अपराधी सिर्फ "बाल मजदूरी" करवाने वाला नहीं बल्कि हर वो शख्स अपराधी है, जो छोटे बच्चों को होटल में काम करते हुए, बोझा ढोते हुए, या मजदूरी करते हुए देख कर भी असहज नहीं होता.
कवि राजेश जोशी ने बाल श्रम की वीभत्सता को अपनी कविता में बड़ी ही मार्मिकता से बयान किया है. राजेश जोशी के अनुसार बाल मजदूरी सबसे भयानक पंक्ति है. उन्होंने बाल मजदूरी के लिए समाज को धिक्कारते हुए लिखा है कि -
कोहरे से ढकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं
सुबह-सुबह
काम पर जा रहे हैं
हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह
भयानक है इसे विवरण की तरह लिखा जाना
काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे ?
क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें
क्या दीमकों ने खा लिया है
सारी रंग-बिरंगी किताबों को
क्या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने
क्या किसी भूकंप में ढह गई हैं
सारे मदरसों की इमारतें
क्या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आंगन
खत्म हो गए हैं एकाएक
तो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में ?
कितना भयानक होता अगर ऐसा होता
भयानक है लेकिन इससे भी ज्यादा वह
कि सारी चीजें हस्बमामूल
पर दुनिया की हजारों सड़कों से गुजरते हुए
बच्चे, बहुत छोटे-छोटे बच्चे
काम पर जा रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार भारत में मजदूरी करने वाले बच्चों की एक बड़ी तादाद ग्रामीण इलाकों से सम्बन्ध रखती है.
अगर आंकड़ों पर गौर किया जाये तो पता चलता है कि लगभग 80 फ़ीसदी बाल मजदूरी की जड़ें ग्रामीण क्षेत्रों में ही फैली हैं.भारत में 2011 के आधार पर सेक्टर आधारित बाल मजदूरी को देखा जाये तो बच्चों की सबसे बड़ी आबादी यानी 32.9 फीसदी (33 लाख) खेती से जुड़े कामों में लगी है, वहीँ 26 फीसदी (26.30 लाख) बच्चे खेतीहर मजदूर हैं.
बाल मजदूरों की अधिकांश संख्या देश के 5 राज्यों बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में हैं. इन राज्यों में बाल मजदूरों की कुल लगभग 55 प्रतिशत है. सबसे ज्यादा बाल मजदूर उत्तर प्रदेश और बिहार से ताल्लुक रखते हैं . आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में 21.5 फीसदी यानी 21.80 लाख और बिहार में 10.7 फीसदी यानी 10.9 लाख बाल मजदूर हैं. राजस्थान में 8.5 लाख बाल मजदूर हैं.
देश में सरकारें आती है, जाती हैं, नए दावे और वादें करतीं है लेकिन बाल श्रम का अभिशाप ख़त्म करने में तमाम सरकारी प्रयास नाकाफी साबित हुए हैं. संभवतः भारत में बाल मजदूरी तभी बंद हो सकती है जब राजनीति और समाज कोई क्रांतिकारी बदलाव हो. शायद मशहूर शायर मुन्नवर राना ने बाल श्रमिकों की स्थिति व सरकारी दावों की हकीकत को देखकर ही , खुद को और समाज को तसल्ली देते हुए लिखा है कि -
फ़रिश्ते आ कर उन के जिस्म पर ख़ुश्बू लगाते हैं
वो बच्चे रेल के डिब्बों में जो झाड़ू लगाते हैं

