ईश्वरचंद्र के पिता ठाकुरदास कलकत्ता में नौकरी करते थे. वे ईश्वरचंद्र को अच्छी शिक्षा के लिए अपने साथ ले जाना चाहते थे. ठाकुरदास और ईश्वरचंद्र के साथ एक शिक्षक और नौकर भी थे. उन दिनों लोग पैदल यात्रा करते थे. रात होने पर किसी गांव में रुक जाते. गांव-देहात से निकल कर काफिला मुख्य सड़क पर पहुंचा. सड़क किनारे एक पत्थर था. ईश्वरचंद्र ने पूछा, ये पत्थर क्या है?
पिता ने बताया कि ये मील का पत्थर है. कुछ दूर चलने के बाद दूसरा पत्थर आ गया. फिर ईश्वरचंद्र ने पूछा. इस बार पिता ने बताया कि पत्थर तो वही है. लेकिन उस पर लिखा अंक दूसरा है. साथ ही ये भी बताया कि कलकत्ता तक ये पत्थर मिलते रहेंगे. लेकिन इन पर लिखे अंक घटते रहेंगे. बालक ईश्वरचंद्र का कौतुहल शांत नहीं हुआ था. उसने पूछा, इस पर लिखे अंक कैसे हैं? पिता ने बताया, ये अंग्रेजी में लिखे अंक हैं. यहां उन्नीस लिखा है. एक और नौ.
इसके बाद ईश्वरचंद्र ने चुप्पी साध ली. काफी देर तक कुछ नहीं बोले. पिता को कुछ संशय हुआ. उन्होंने पूछा, इतने चुप क्यों हो, कुछ चाहिए तो नहीं?
ईश्वरचंद्र ने जवाब दिया. नहीं, मैं तो अंग्रेजी के अंक सीख रहा हूं.
पिता ने पूछा, अच्छा तो बताओ हम कलकत्ता से कितनी दूर हैं. ईश्वरचंद्र ने बताया. सामने पत्थर पर 10 लिखा है. हम अब तक 9 मील की यात्रा कर चुके हैं. सारे लोग चकित थे. और पिता अपने बच्चे की मेधा पर खुश. एक कहावत है.
होनहार बिरवान के होत चिकने पात. ईश्वरचंद्र इसी को सच साबित कर रहे थे. ईश्वरचंद्र को आगे चलकर विद्यासागर की उपाधि मिली. ये इसलिए कि लोग उन्हें विद्या का सागर मानते थे.
- मनुष्य कितना भी बड़ा क्यों न बन जाए उसे हमेशा अपना अतीत याद करते रहना चाहिए.
- अपने हित से पहले समाज और देश के हित को देखना विवेक युक्त सच्चे नागरिक का धर्म होता है.
- समस्त जीवो में मनुष्य सर्वक्षेस्त बताया गया है क्योंकि उसके अंदर आत्मविश्वास और आत्मज्ञान होता है.
- अगर आपको सफल और प्रतिष्ठित बनना है तो आपको झुकना सीखना होगा क्योंकि जो झुकते नहीं है,समय की हवा उन्हें झुका देती है.
- विद्या सबसे अनमोल धन है इसके आने मात्र से ही सिर्फ अपना ही नहीं बल्कि पूरे समाज का कल्याण हो जाता है
- एक मनुष्य का सबसे बड़ा कर्म दूसरों की भलाई और सहयोग होना चाहिए जो एक संपन्न राष्ट्र का निर्माण कर सकता है
- बिना कष्ट किए जीवन एक बिना नाविक के नाव के जैसा है जिसमे खुद का कोई विवेक नहीं होता है एक हल्की हवा के झोंके में भी चल देता है.
- दूसरों के कल्याण से बढ़कर दूसरा और कोई नेक काम और धर्म नहीं होता है
- जो व्यक्ति दूसरों के काम नहीं आता है वह वास्तव में मनुष्य नहीं है
- संसार में सफल और सुखी वह लोग हैं जिनके अंदर विनय हो और विनय विद्या से ही आती है
- अगर कोई मनुष्य बड़ा बनना चाहता है तो छोटे से छोटे काम भी करे क्योकि स्वावलंबी ही श्रेष्ठ होते है.
ईश्वरचंद्र विद्यासागर का असली नाम ईश्वरचंद्र बंदोपाध्याय था. जिस समय महिलाओं का घर से बाहर निकलना भी ‘पाप’ माना जाता था. उस समय उन्होंने महिलाओं को पढ़ाई लिखाई के लिए लड़ाई लड़ी. उन्हें चहारदीवारी से बाहर निकाला और उनके अधिकारों के लिए आंदोलन किया. विद्यासागर ने विधवा महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए संघर्ष किया. विधवा पुनर्विवाह एक्ट पास कराया और अपने बेटे की शादी भी एक विधवा महिला से कराई. ईश्वरचंद्र संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे. वे कलकत्ता के संस्कृत कॉलेज के प्रिंसिपल रहे. 1872 में उन्होंने मेट्रोपॉलिटन इंस्टीट्यूट की स्थापना की. यह पहला प्राइवेट कॉलेज था. जिसमें भारतीय पढ़ाते थे, भारतीय ही चलाते थे और भारतीय ही फाइनेंस करते थे. 29 जुलाई, 1891 में विद्यासागर का निधन हो गया. 1917 में मेट्रोपॉलिटन कॉलेज का नाम विद्यासागर कॉलेज कर दिया गया. जब से पढ़ना सीखा. कहानियां पढ़ने में खूब मन लगता. स्कूली किताबों में भी जिनमें कहानी होती वो सबसे पहले पढ़ता. ऐसी ही एक किताब थी. भारत के महान व्यक्तित्व. नैतिक शिक्षा में इसे पढ़ाया जाता. इसी किताब में एक कहानी थी. मील का पत्थर. जहां पहली बार ईश्वर चंद्र विद्यासागर से परिचय हुआ. नाम थोड़ा अजीब लगा, लेकिन दिमाग में बैठ गया. कुछ महीनों पहले जब विद्यासागर कॉलेज में भारत के इस महान व्यक्तित्व की मूर्ति पर हमला किया गया और तोड़ा गया. तो विद्यासागर का नाम एक बार फिर गूंजने लगा. तो पढ़िए विद्यासागर के जीवन के 5 किस्से. जो उनकी सादगी, मेधा और उनके संघर्ष को प्रदर्शित करते हैं.

