सुंदर मुंदरिये हो !

तेरा कौन विचारा हो !

दुल्ला भट्टी वाला हो !

दुल्ले धी व्याही हो !

सेर शक्कर पाई हो !

कुड़ी दे जेबे पाई

कुड़ी दा लाल पटाका हो !

कुड़ी दा सालू पाटा हो !

सालू कौन समेटे हो !

चाचे चूरी कुट्टी हो !

ज़मिदारां लुट्टी हो !

ज़मींदार सदाए हो !

गिन-गिन पोले लाए हो !

इक पोला रह गया !

सिपाही फड के लै गया !

सिपाही ने मारी ईट

भावें रो भावें पिट

सानू दे दे लोहड़ी

तुहाडी बनी रवे जोड़ी !

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आज युवाओं के लिए लोहड़ी मात्र एक पर्व बनकर रह गया है जिसे बस वह “मना” लेने की औपचारिकता भर निभाते हैं लेकिन भले ही समाज में पारंपरिक ढंग से मनाए जाने वाले पर्व लोहड़ी के रीति रिवाजों में समाज के बदलते परिवेश के चलते काफी बदलाव आया है, लेकिन अब भी अधिकतर परिवारों में परंपरा का निर्वाह किया जा रहा है.


कहा जाता है कि एक ब्राह्मण की 2 लड़कियों सुंदरी और मुंदरी के साथ इलाके का मुगल शासक जबरन शादी करना चाहता था, पर उन दोनों की सगाई कहीं और हुई थी और उस मुगल शासक के डर से उनके भावी ससुराल वाले शादी के लिए तैयार नहीं थे। इस मुसीबत की घड़ी में दूल्ला भट्टी ने ब्राह्मण की मदद की और लड़के वालों को मनाकर एक जंगल में आग जला कर सुंदरी और मुंदरी का व्याह करवाया। दूल्ले ने खुद ही उन दोनों का कन्या दान किया। दूल्ला भट्टी की जुल्म के खिलाफ मानवता की सेवा को आज भी लोग याद करते हैं और उस रात को लोहड़ी के रूप में सत्य और साहस की जुल्म पर जीत के तौर पर मनाते हैं।


लोहड़ी का सबंध फसल से भी है, इस समय गेहूं और सरसों की फसलें अपने यौवन पर होती हैं, खेतों में गेहूं, चने और सरसों जैसी फसलें लहराती हैं। लोहड़ी के दिन गांव के लड़के-लड़कियां अपनी-अपनी टोलियां बना कर घर-घर जा कर लोहड़ी के गाने गाते हुए लोहड़ी मांगते हैं।

इन गीतों में दूल्ला भट्टी का गीत

'सुंदर, मुंदरिये हो, तेरा कौन विचारा हो.' ,

'दे माई लोहड़ी, तेरी जीवे जोड़ी',

'दे माई पाथी तेरा पुत्त चड़ेगा हाथी'

... आदि प्रमुख हैं। लोग उन्हें लोहड़ी के रूप में गुड़, रेवड़ी, मूंगफली, तिल या फिर पैसे भी देते हैं। ये टोलियां रात को अग्नि जलाने के लिए घरों से लकड़ियां, उपलें आदि भी इकट्ठा करती हैं और रात को गांव के लोग अपने मोहल्ले में आग जला कर गीत गाते, भांगडा-गिद्धा करते, गुड़, मूंगफली, रेवड़ी, धानी खाते हुए लोहड़ी मनाते हैं। लोहड़ी का सबंध नए जन्मे बच्चों के साथ ज्यादा है। पुराने समय से ही यह रीत चली आ रही है कि जिस घर में लड़का जन्म लेता है, उस घर में लोहड़ी मनाई जाती है।