देवानंद और क्लास एक दूसरे के समानुपाती शब्द हैं। न सिर्फ व्यक्तित्व बल्कि देवानंद का कृतित्व भी देवत्व को छूता है।' यथा नाम तथा गुणे' को अगर किसी ने चरितार्थ किया है, तो वो हैं देवानंद हैं!
देव आनंद ने हमेशा जिंदगी को आनंद के रूप में लिया। उनके भीतर की जिंदादिली ने उन्हें कभी बूढ़ा नहीं होने दिया। उनका अंदाज उनके हजारों-लाखों चाहने वालों के भीतर आज भी जवान है।
हिंदी फिल्मों के सदाबहार अभिनेता देव आनंद को उनके खास अंदाज के लिए जाना जाता है या कहें कि यही अंदाज उन्हें देवानंद बनाता है। उन्होंने हमेशा जिंदगी को आनंद के रूप में लिया। उनके भीतर की जिंदादिली ने उन्हें कभी बूढ़ा नहीं होने दिया। उनका अंदाज उनके हजारों-लाखों चाहने वालों के भीतर आज भी जवान है। समचार एजेंसी पीटीआई को दिए एक इंटरव्यू में देव आनंद ने कहा था, 'मैं हमेशा जल्दबाजी में रहता हूं क्योंकि वक्त बहुत तेजी से फिसलता जा रहा है और मैं उसके पीछे भाग रहा हूं। मेरे पास बताने को बहुत सी कहानियां हैं लेकिन वक्त नहीं। काश मैं एक बार फिर देव आनंद बन कर जन्म लेता और आप लोगों से 25 साल बाद एक युवा अभिनेता के रूप में मिलता।' देव आनंद ने बॉलीवुड में दो दशक तक राज किया। अभिनय के साथ ही उन्होंने लेखन, निर्देशन, फिल्म निर्माण में न केवल अपना हाथ आजमाया बल्कि सफलता के शिखर को भी छुआ और यहां तक पहुंचने के लिए देव ने अथक मेहनत और निरंतर काम किया था। फिल्म मैगज़ीन मायापुरी के 1975 में छपे अंक में देव के बारे में एक काफी रोचक और प्रेरक घटना का ब्यौरा है, 'कुछ ही दिनों पहले की बात है एक करोड़ रूपयों से भी अधिक लागत की, तेरह हजार फुट ऊंची हिमालय की बर्फीली चोटियों पर फिल्मायी गयी देव आनंद की आकांक्षापूर्ण फिल्म ‘इश्क इश्क इश्क’ फ्लॉप हो गयी तो एक ज्योतिषी महाराज जंत्र-मंत्र का कुछ टोटका लेकर देव साहब के पास पहुंचे। उन्होंने देव साहब पर प्रभाव ड़ालने की पूरी कोशिश की थी, पर देव साहब ने बड़ी फुर्ती से उनकी छुट्टी करते हुए कहा, मैं गीता के कर्म में विश्वास करता हूं, फल की चिंता नही करता और न कभी पीछे मुड़ कर देखता हूं मेरा काम है काम करते रहना, जो मैं कर रहा हूं कुछ और सेवा हो तो बताइये।
देव आनंद ने बॉलीवुड में दो दशक तक राज किया। अभिनय के साथ ही उन्होंने लेखन, निर्देशन, फिल्म निर्माण में न केवल अपना हाथ आजमाया बल्कि सफलता के शिखर को भी छुआ और यहां तक पहुंचने के लिए देव ने अथक मेहनत और निरंतर काम किया था..
फिल्म मैग्जीन मायापुरी के 1975 में छपे अंक में देव के बारे में एक काफी रोचक और प्रेरक घटना का ब्यौरा है, 'कुछ ही दिनों पहले की बात है एक करोड़ रूपयों से भी अधिक लागत की, तेरह हजार फुट ऊंची हिमालय की बर्फीली चोटियों पर फिल्मायी गयी देव आनंद की आकांक्षापूर्ण फिल्म ‘इश्क इश्क इश्क’ फ्लॉप हो गयी तो एक ज्योतिषी महाराज जंत्र-मंत्र का कुछ टोटका लेकर देव साहब के पास पहुंचे। उन्होंने देव साहब पर प्रभाव ड़ालने की पूरी कोशिश की थी, पर देव साहब ने बड़ी फुर्ती से उनकी छुट्टी करते हुए कहा, मैं गीता के कर्म में विश्वास करता हूं, फल की चिंता नही करता और न कभी पीछे मुड़ कर देखता हूं मेरा काम है काम करते रहना, जो मैं कर रहा हूं कुछ और सेवा हो तो बताइये।
जब बनी आइकॉनिक फिल्म गाइड:
देव आनंद प्रख्यात उपन्यासकार आर.के. नारायण से काफी प्रभावित थे और उनके उपन्यास ‘गाइड’ पर फिल्म बनाना चाहते थे। आर.के. नारायणन की स्वीकृति के बाद उन्होंने हॉलीवुड के सहयोग से हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में फिल्म ‘गाइड’ का निर्माण किया, जो देव की पहली रंगीन फिल्म थी। इस फिल्म में जोरदार अभिनय के लिए देव को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार भी दिया गया। वर्ष 1970 में फिल्म ‘प्रेम पुजारी’ के साथ देव आनंद ने निर्देशन के क्षेत्र में भी कदम रख दिया। हालांकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह विफल रही, बावजूद इसके उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वर्ष 1971 में उन्होंने फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ का निर्देशन किया और इसकी कामयाबी के बाद उन्होंने अपनी कई फिल्मों का निर्देशन किया!
लार्जर दैन लाइफ देव बाबू देव को वर्ष 1993 में फिल्मफेयर ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’ और 1996 में स्क्रीन वीडियोकॉन ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। देव को अभिनय के लिए दो बार फिल्म फेयर पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। उन्हें पहला फिल्म फेयर पुरस्कार वर्ष 1950 में प्रदर्शित फिल्म ‘काला पानी’ के लिए दिया गया। इसके बाद वर्ष 1965 में ‘गाइड’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार उन्हें मिला। देव आनंद को वर्ष 2001 में भारत सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया। हिन्दी सिनेमा में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए वर्ष 2002 में देव आनंद को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारतीय सिनेमा के सदाबहार अभिनेता देवानंद का 3 दिसंबर, 2011 को लंदन में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वह 88 वर्ष के थे। आज भले ही वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका अंदाज, जिंदादिली लोगों के जेहन में जिंदा है।
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