मै निराश नहीं अब भी

पर निशब्द ज़रूर हूँ

मुझे मौसम, गुल , गुलनार और हवाएँ

नहीं दिखती , नहीं महसूस होती


निशब्द ही नहीं , इस दुःख के सैलाब

के आगे निस्तब्द हूँ

इस ख़ौफ़नाक ग़म में ,

इस एकांकी दर्द में

मैं अकेले नहीं


हज़ारों और भी हम जैसे

लड़ रहें हैं चुप चाप

तड़प रहें हैं अंदर अंदर

एक एक जान के लिए


नहीं , हम नहीं डरते अंधेरों से

मगर इस कदर अंधेरे कब हुए हैं कहीं

रोशनी परास्त हम लोग

देख रहें हैं मूक

कहीं इंसानों की जलती चिताएँ

कहीं इंसानियत की जलती मशालें


ये अजब गफ़लत का दौर है

निराशा और आशा एक साथ

पुतलियों में झलकते हैं ,

हम भी रोज़ इन्हीं में

डूबते और उभरते हैं ...


अपनों से इलावा किसी के लिए दुआ

कभी पहले, इस शिद्दत से न की

खुद से बढ़कर , हर बंदे से कभी

यूँ अपनापन और खुदाई मोहब्बत न की ,

इसमें भी हम अकेले नहीं

शायद इस अनहोनी के अज़ाब में

तभी कुछ उम्मीद ज़िंदा है ...