एक बीते के बराबर
यह हरा ठिंगना चना
बांधे मुरैठा शीश पर
छोटे गुलाबी फूल का
सजकर खड़ा है
पास ही मिलकर उगी है
बीच में अलसी हठीली
देह की पतली, कमर की है लचीली
नीले फूले फूल को सिर पर चढ़ाकर
कह रही है जो छुए यह
दूं हृदय का दान उसको
और सरसों की न पूछो
हो गई सबसे सयानी, हाथ पीले कर लिए हैं
ब्याह मण्डप में पधारी
फाग गाता मास फागुन
आ गया है आज जैसे
देखता हूं मैं स्वयंवर हो रहा है
प्रकृति का अनुराग-अंचल हिल रहा है
इस विजन में
दूर व्यापारिक नगर में
प्रेम की प्रिय भूमि उपजाऊ अधिक है...

