अजब मंज़र है मन घबरा रहा है

जिसे देखो वो भागा जा रहा है


हमें भरमा रही है याद उनकी

उन्हें किसका तसव्वुर भा रहा है


उदासी इस क़दर पहले कहाँ थी

कि हँसने पर भी रोना आ रहा है


कहाँ गुम हो गईं वो तितलियाँ सब

उन्हें ढूँढो कि बचपन जा रहा है


है बदक़िस्मत वो आदम ज़ात जिसको

ख़ुद अपना दोगलापन खा रहा है


सफ़े तारीख़ के सब कह रहे हैं

हमें कातिब बड़ा उलझा रहा है