सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
साथ चलो, साथ बोलो। तुम्हारे मन साथ विचार करें।
(ऋग्वेद 10/136/4)
जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसाम्।
घर की भांति पृथ्वी अनेक भाषा बोलने वाले तथा अनेक धर्मों वाले लोगों को धारण करती है।
(यजुर्वेद 12/1/45)
परिमितं वै भूतम्। अपरिमितं भव्यम्।
जो हो चुका है, वह ससीम है। जिसे होना है, वह असीम है।
(ऐतरेयब्राह्मणम् 4/6)
असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय।
मुझे असत् से सत् की ओर, अन्धकार से प्रकाश की ओर एवं मृत्यु से अमरता की ओर ले जाओ।
(बृहदारण्यक—उपनिषद् 1/3/28)
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
उठो, जागो, श्रेष्ठ (आचार्यों) को पाकर ज्ञान प्राप्त करो।
(कठोपनिषद् 3/14)

