तेजस्विनि क्षमोपेते नातिकार्कश्यमाचरेत्!

अतिनिर्मथनाद्वह्निश्चन्दनादपि जायते!!

[तेजस्वी और​ क्षमाशील व्यक्ति से कभी भी अतिकठोर आचरण नहीं करना चाहियें। अति घर्षण से चन्दन की लकडी में भी अग्नि उत्पन्न होती हैं।]

मा कुरु धनजनयौवनगर्वं हरति निमेषात्कालः सर्वम्।

मायामयमिदमखिलं हित्वा ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा॥

[धन, जन, और यौवन पर घमण्ड मत करो; काल इन्हें पल में छीन लेता है। इस माया को छोड़ कर इस ज्ञान से ब्रह्मपद में प्रवेश करो।]

कल्पयति येन वृत्तिं येन च लोके प्रशस्यते सद्भिः।

स गुणस्तेन च गुणिना रक्ष्यः संवर्धनीयश्च॥

[जिस गुण से आजीविका का निर्वाह हो और जिसकी सभी प्रशंसा करते हैं, अपने स्वयं के विकास के लिए उस गुण को बचाना और बढ़ावा देना चाहिए।]

जरामृत्यू हि भूतानां खादितारौ वृकाविव ।

बलिनां दुर्बलानां च ह्रस्वानां महतामपि ॥

[बुढ़ापा और मृत्यु ये दोनों भेड़ियों के समान हैं जो बलवान, दुर्बल, छोटे और बड़े सभी प्राणियों को खा जाते हैं]

आरोप्यते शिला शैले यथा यत्नेन भूयसा।

निपात्यते सुखेनाधस्तथात्मा गुणदोषयोः॥

[जैसे कोई पत्थर बड़े कष्ट से पहाड़ के ऊपर पहुँचाया जाता है पर बड़ी आसानी से नीचे गिर जाता है, वैसे ही हम भी अपने गुणों के कारण ऊँचे उठते हैं किंतु हम एक ही दुष्कर्म से आसानी से गिर सकते हैं।]

यथा ह्यल्पेन यत्नेन च्छिद्यते तरुणस्तरुः।

स एवाऽतिप्रवृध्दस्तु च्छिद्यतेऽतिप्रयत्नतः॥

एवमेव विकारोऽपि तरुणः साध्यते सुखम्।

विवृध्दः साध्यते कृछ्रादसाध्यो वाऽपि जायते॥

[जैसे छोटे पौधे आसानी से तोड़े जा सकते हैं पर बड़े पेड़ नही, वैसे ही रोग का शुरुआत में ही उपचार करना आसान होता है, बढ़ने पर साध्य से असाध्य ही हो जाता है।]

युक्ति युक्तं प्रगृह्णीयात् बालादपि विचक्षणः।

रवेरविषयं वस्तु किं न दीपः प्रकाशयेत्॥

[बुद्धिमान को बच्चों से भी युक्तिपूर्ण वचन ग्रहण करने चाहिए। क्या दीप उस वस्तु को प्रकाशित नहीं करता, जिसे सूर्य प्रकाशित नहीं कर सकता ?]

लये संबोधयेत् चित्तं विक्षिप्तं शमयेत् पुनः।

सकशायं विजानीयात् समप्राप्तं न चालयेत् ॥

[जब चित्त निष्क्रिय हो जाये, तो उसे संबुद्ध करो। संबुद्ध चित्त जब अशान्त हो, उसे स्थिर करो। चित्त पर जमे मैल (अहंकार तथा अज्ञानता) को पहचानो। समवृत्ति को प्राप्त होने पर इसे फिर विचलित मत करो।]

प्रथमे नार्जिता विद्या द्वितीये नार्जितं धनम् ।

तृतीये नार्जितं पुण्यं चतुर्थे किं करिष्यसि ॥

[यदि जीवन के प्रथम भाग में विद्या, दूसरे में धन, और तीसरे में पुण्य नही कमाया, तो चौथे भाग में क्या करोगे ?]

विवादो धनसम्बन्धो याचनं चातिभाषणम् ।

आदानमग्रतः स्थानं मैत्रीभङ्गस्य हेतवः॥

[वाद-विवाद, धन के लिये सम्बन्ध बनाना, माँगना, अधिक बोलना, ऋण लेना, आगे निकलने की चाह रखना – यह सब मित्रता के टूटने में कारण बनते हैं।]