हंसो तो साथ हंसेगी दुनिया बैठ अकेले रोना होगा

चुपके चुपके बहा कर आंसू दिल के दुख को धोना होगा


[Kavishala Labs]ये पंक्तियाँ हैं लिखी हैं मशहूर शायर मीराजी ने. मीराजी ने न सिर्फ आधुनिक उर्दू ग़ज़ल और नज्म को नया आयाम दिया बल्कि उन्होंने हिंदी ग़ज़ल का मार्ग भी प्रशस्त किया. उनकी रचनाओं में मोहब्बत, जुदाई, वस्ल की उम्मीद देखने को मिलती है. मीराजी की शख्सियत विलक्षण थी. उनको देख कर ऐसा नहीं लगता था की वे एक शायर होंगे. विलक्षण शख्सियत और प्रेम-विरह में डूबी अपनी अलग तरह की रचनाओं की वजह से मीराजी प्रसिद्ध है.


मीराजी : (25 मई 1912 - 3 नवंबर, 1949) का मूल नाम मुहम्मद सनाउल्ला सनी दार था . वे एक प्रसिद्ध उर्दू शायर थे. मीराजी बोहेमियन की तरह रहते थे. उन्होंने अपना पूरा जीवन इसी तरह बिताया. मीराजी ने अपने कपड़े पहनने के ढंग को बदला हुआ था. लम्बे बाल, रौबदार मूंछे, कानो में बड़ी बड़ी बालियाँ. एक रंगीन हेडगियर, गर्दन के चारों ओर मोती की एक स्ट्रिंग लटकाए रहते थे. 


प्रेमिका के नाम को जोड़ा खुद के नाम से : कहा जाता है कि मुहम्मद सनाउल्ला सनी दार को एक बंगाली लड़की से प्यार हो गया था उस लड़की का नाम मीरा था. लेकिन मुहम्मद सनाउल्ला सनी दार का प्यार सफल नहीं हो सका. तो उन्होंने अपनी प्रेमिका की याद में अपने नाम के साथ अपनी प्रेमिका का नाम भी जोड़ लिया. और बाद में वे मीराजी के नाम से ही प्रसिद्ध हो गए.  


मीराजी ने आल इंडिया रेडियो में कार्य किया( दिल्ली ). मासिक पत्रिका साक़ी (दिल्ली) के लिए साहित्यिक स्तंभ लिखे. देश के विभाजन के बाद, वह स्थायी रूप से मुंबई में रहने लगे. मीराजी हिंदू पौराणिक कथाओं के प्रति आकर्षित हुए. हिंदी शब्दावली अक्सर उनकी कविता, गद्य और पत्रों में देखने को मिलती है. उन्होंने संस्कृत कवि अमरू और फ्रेंच कवि बाउडेलेयर का प्रभाव अपने ऊपर स्वीकार्य किया था.


उर्दू के अदब के मशहूर कहानीकार और लेखक मंटो भी मीराजी की शक्शियत से बहुत प्रभावित थे. उन्होंने "तीन गोले" में मीराजी के बारे में लिखा है कि, "उस ज़माने की बात है जब शाइर, अदीब और एडिटर आम तौर पर लांडरी में नंगे बैठ कर ‎डबल रेट पर अपने कपड़े धुलवाया करते थे और बड़ी मैली कुचैली ज़िंदगी बसर करते थे, मैंने ‎सोचा, शायद मीराजी भी उसी क़िस्म का शाइर और एडिटर है. लेकिन उसकी ग़लाज़त. उसके ‎लंबे बाल, उसकी फ़्रैंच कट दाढ़ी. गले की माला और वो तीन आहनी गोले... मआशी हालात के ‎मज़हर मालूम नहीं होते थे. उनमें एक दरवेशाना पन था एक क़िस्म की राहबियत.."  


मीराजी उर्दू ग़ज़ल व नज्मो में बिम्बो को स्थापित करने वाले शुरुआती शायरों में से एक थे. वे खुद में ही खोये रहते थे. कोई उनके बारे में क्या बोलता और सोंचता है उन्हें इस बारे में कोई फिक्र नहीं थी. मीराजी ने कई रचनाएं लिखी किन्तु अपने जीवनकाल के दौरान उन्होंने अधिकांश रचनाओं को प्रकाशित नहीं करवाया. खालिद हसन ने अपने लेखन "मीरा सेन के भूले हुए प्रेमी" में लिखा है कि :मेराजी के जीवनकाल के दौरान मीराजी के कार्यों के चार संग्रह शाहिद अहमद देहलावी और लाहौर के मकतबा-ए-उर्दू द्वारा प्रकाशित किए गए थे. उनकी रचनाएं कुलीयत-ए-मीराजी 1988 में डॉ जमील जलबी द्वारा संपादित किया गया था. बाकियत-ए-मीराजी नामक एक और संग्रह 1990 में शीमा मजीद द्वारा संपादित किया गया था. "इज़ नाज़म मीन" नामक एक पुस्तक जिसका निबंध अरायस मीराजी था, उनके जीवनकाल के दौरान प्रकाशित हुआ था"


आधुनिक उर्दू अदब में नज्म को नई दिशा देने और हिंदी साहित्य में ग़ज़ल की रुपरेखा बनाने में मीराजी का योगदान उल्लेखनीय है. उनकी रचनाएं भी उनकी शख्सियत की तरह किसी को भी बड़ी ही सहजता से अपनी और आकर्षित कर लेती है. पढ़िए मीराजी की कुछ रचनाएं-


[१]

नगरी नगरी फिरा मुसाफ़िर घर का रस्ता भूल गया 

क्या है तेरा क्या है मेरा अपना पराया भूल गया 

क्या भूला कैसे भूला क्यूँ पूछते हो बस यूँ समझो 

कारन दोश नहीं है कोई भूला भाला भूल गया 

कैसे दिन थे कैसी रातें कैसी बातें घातें थीं 

मन बालक है पहले प्यार का सुंदर सपना भूल गया 

अँधियारे से एक किरन ने झाँक के देखा शरमाई 

धुँदली छब तो याद रही कैसा था चेहरा भूल गया 

याद के फेर में आ कर दिल पर ऐसी कारी चोट लगी 

दुख में सुख है सुख में दुख है भेद ये न्यारा भूल गया 

एक नज़र की एक ही पल की बात है डोरी साँसों की 

एक नज़र का नूर मिटा जब इक पल बीता भूल गया 

सूझ-बूझ की बात नहीं है मन-मौजी है मस्ताना 

लहर लहर से जा सर पटका सागर गहरा भूल गया


[२]

हँसो तो साथ हँसेंगी दुनिया बैठ अकेले रोना होगा

चुपके चुपके बहा कर आँसू दिल के दुख को धोना होगा

बैरन रीत बड़ी दुनिया की आँख से जो भी टपका मोती

पलकों ही से उठाना होगा पलकों ही से पिरोना होगा

खोने और पाने का जीवन नाम रखा है हर कोई जाने

उस का भेद कोई न देखा क्या पाना क्या खोना होगा

बिन चाहे बिन बोले पल में टूट फूट कर फिर बन जाए

बालक सोच रहा है अब भी ऐसा कोई खिलौना होगा

प्यारों से मिल जाएँ प्यारे अनहोनी कब होनी होगी

काँटे फूल बनेंगे कैसे कब सुख सेज बिछौना होगा

बहते बहते काम न आए लाख भँवर तूफ़ानी-सागर

अब मंजधार में अपने हाथों जीवन नाव डुबोना होगा

जो भी दिल ने भूल में चाहा भूल में जाना हो के रहेगा

सोच सोच कर हुआ न कुछ भी आओ अब तो खोना होगा

क्यूँ जीते-जी हिम्मत हारें क्यूँ फ़रियादें क्यूँ ये पुकारें

होते होते हो जाएगा आख़िर जो भी होना होगा

'मीरा-जी' क्यूँ सोच सताए पलक पलक डोरी लहराए

क़िस्मत जो भी रंग दिखाए अपने दिल में समोना होगा


[३]

जैसे होती आई है वैसे बसर हो जाएगी

ज़िंदगी अब मुख़्तसर से मुख़्तसर हो जाएगी

गेसू-ए-अक्स-ए-शब-ए-फ़ुर्क़त परेशाँ अब भी है

हम भी तो देखें कि यूँ क्यूँकर सहर हो जाएगी

इंतिज़ार-ए-मंज़िल-ए-मौहूम का हासिल ये है

एक दिन हम पर इनायत की नज़र हो जाएगी

सोचता रहता है दिल ये साहिल-ए-उम्मीद पर

जुस्तुजू आईना-ए-मद्द-ओ-जज़र हो जाएगी

दर्द के मुश्ताक़ गुस्ताख़ी तो है लेकिन मुआ'फ़

अब दुआ अंदेशा ये है कारगर हो जाएगी

साँस के आग़ोश में हर साँस का नग़्मा ये है

एक दिन उम्मीद है उन को ख़बर हो जाएगी


[]

दिल महव-ए-जमाल हो गया है

या सर्फ़-ए-ख़याल हो गया है

अब अपना ये हाल हो गया है

जीना भी मुहाल हो गया है

हर लम्हा है आह आह लब पर

हर साँस वबाल हो गया है

वो दर्द जो लम्हा भर रुका था

मुज़्दा कि बहाल हो गया है

चाहत में हमारा जीना मरना

आप अपनी मिसाल हो गया है

पहले भी मुसीबतें कुछ आईं

पर अब के कमाल हो गया है