उत्तराखंड को देवभूमि कहा गया है. यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य, शीतल हवा दूर दूर तक फैले पर्वत और सघन वन ह्रदय को शांति देते हैं. ऐसा लगता है मानो आप स्वर्ग में हैं. यहाँ की प्राकृतिक रमणीयता, नयनाभिराम भव्यता अनायास ही किसी के भी अंदर कवि की आत्मा जाग्रत कर देती है. देवभूमि उत्तराखंड में कई महान साहित्यकारों ने जन्म लेकर हिंदी, व क्षेत्रीय भाषा (कुमाउनी, गढ़वाली) साहित्य को समृद्ध किया है.

आइये मिलते है उत्तराखंड में जन्मे व उत्तराखंड को कर्म स्थली बना कर साहित्य सृजन करने वाले कुछ साहित्यकारों से:


सुमित्रानंदन पंत (२० मई १९०० - २८ दिसम्बर १९७७) हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं. उनका जन्म कौसानी बागेश्वर में हुआ था. झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भ्रमर-गुंजन, उषा-किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब तो सहज रूप से काव्य का उपादान बने. निसर्ग के उपादानों का प्रतीक वबिम्ब के रूप में प्रयोग उनके काव्य की विशेषता रही. उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था. प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताएं-


[१]

चींटी को देखा?

वह सरल, विरल, काली रेखा

तम के तागे सी जो हिल-डुल,

चलती लघु पद पल-पल मिल-जुल,

यह है पिपीलिका पाँति! देखो ना, किस भाँति

काम करती वह सतत, कन-कन कनके चुनती अविरत।


गाय चराती, धूप खिलाती,

बच्चों की निगरानी करती

लड़ती, अरि से तनिक न डरती,

दल के दल सेना संवारती,

घर-आँगन, जनपथ बुहारती।


चींटी है प्राणी सामाजिक,

वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक।

देखा चींटी को?

उसके जी को?

भूरे बालों की सी कतरन,

छुपा नहीं उसका छोटापन,

वह समस्त पृथ्वी पर निर्भर

विचरण करती, श्रम में तन्मय

वह जीवन की तिनगी अक्षय।


वह भी क्या देही है, तिल-सी?

प्राणों की रिलमिल झिलमिल-सी।

दिनभर में वह मीलों चलती,

अथक कार्य से कभी न टलती।


[२]

चाँदी की चौड़ी रेती,

फिर स्वर्णिम गंगा धारा,

जिसके निश्चल उर पर विजड़ित

रत्न छाय नभ सारा!


फिर बालू का नासा

लंबा ग्राह तुंड सा फैला,

छितरी जल रेखा--

कछार फिर गया दूर तक मैला!


जिस पर मछुओं की मँड़ई,

औ’ तरबूज़ों के ऊपर,

बीच बीच में, सरपत के मूँठे

खग-से खोले पर!


पीछे, चित्रित विटप पाँति

लहराई सांध्य क्षितिज पर,

जिससे सट कर

नील धूम्र रेखा ज्यों खिंची समांतर।


बर्ह पुच्छ-से जलद पंख

अंबर में बिखरे सुंदर

रंग रंग की हलकी गहरी

छायाएँ छिटका कर।


सब से ऊपर निर्जन नभ में

अपलक संध्या तारा,

नीरव औ’ निःसंग,

खोजता सा कुछ, चिर पथहारा!


साँझ,-- नदी का सूना तट,

मिलता है नहीं किनारा,

खोज रहा एकाकी जीवन

साथी, स्नेह सहारा!


चन्द्र कुंवर बर्त्वाल (20 अगस्त 1919 - 1947 ) का जन्म उत्तराखण्ड के चमोली जिले के ग्राम मालकोटी, पट्टी तल्ला नागपुर में हुआ था. वे हिन्दी के कवि थे. उन्होंने मात्र 28 साल की उम्र में हिंदी साहित्य को अनमोल कविताओं का समृद्ध खजाना दे दिया था. समीक्षक चंद्र कुंवर बर्त्वाल को हिंदी का 'कालिदास' मानते हैं. उनकी कविताओं में प्रकृतिप्रेम झलकता है. प्रस्तुत है उनकी कुछ कविताएं-


[१]

मैंने न कभी देखा तुमको,

पर प्राण, तुम्हारी वह छाया

जो रहती है मेरे उर में

वह सुंदर है, पावन सुंदर !


मैंने न सुना कहते तुमको

पर मेरे पूजा करने पर

जो वाणी-सुधा बरसाती है

वह सुंदर है, पावन सुंदर !


मैं उस स्पर्श को क्या जानूँ

पर मेरी गीली पलकों पर

जो मृदुल हथेली फिरती है

वह सुंदर है, पावन सुंदर !


मैंने न कभी देखा तुमको,

पर प्राण, तुम्हारी वह छाया

जो रहती है मेरे उर में

वह सुंदर है, पावन सुंदर !


[२]

घर छोड़े वर्षों बीत गए

मैं हिमगिरी पर हूँ घूम रहा

देखता दृश्य जब नए-नए

वर्षा भी, बर्फ़ानी पहाड़

घनघोर शोर करती नदियाँ

सुनसान पर्वतों पर फैली

पीड़ा से पीली चांदनियाँ

नव-देवदार के जंगल में

छिप कर गाने वाली चिड़ियाँ

ये ही सब मेरे साथी रहे

घर छोड़े वर्षों बीत गए


पूर्व के साहित्यकारों के अलावा उत्तराखंड के समकालीन साहित्यकार भी अपनी उत्कृष्ट रचनाओं से साहित्य के सागर को समृद्ध कर रहे हैं. समकालीन कवियों की रचनाओं में उत्तराखंड के प्राकृतिक सौंदर्य वर्णन के साथ साथ सामाजिक समस्याओं सामाजिक सरोकार से जुड़े सन्दर्भों की भी झलक देखने को मिलती है.  


उत्तराखंड के समकालीन साहित्यकार :-  


रमेश पोखरियाल "निशंक" (जन्म 15 जुलाई 1958 ) एक भारतीय राजनीतिज्ञ तथा वर्तमान केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री, (भारत सरकार) हैं. रमेश पोखरियाल "निशंक" एक राजनीतिज्ञ होने साथ साथ हिन्दी के ख्याति प्राप्त कवि भी हैं. निशंक बचपन से ही कविता और कहानियां लिखते रहे. हालांकि उनका पहला कविता संग्रह वर्ष 1983 में ‘समर्पण’ प्रकाशित हुआ. अब तक उनके 10 कविता संग्रह, 12 कहानी संग्रह, 10 उपन्यास, 2 पर्यटन ग्रन्थ, 6 बाल साहित्य, 2 व्यक्तित्व विकास सहित कुल 4 दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताएं -


[१]

दर्दों का घेरा


हर दुख लगा जग में मेरा है,

इस तरह दर्दों का घेरा है।


कभी अपना भी दूर जाता रहा

मैं अकेला स्वयं को भुलाता रहा

यहाँ सुख के संग संग ही दुख का बसेरा है

इस तरह दर्दों का घेरा है।


मैं तो तिल-तिल ही निज को जलाता रहा,

ठोकरें हर कदम पर भी खाता रहा।

मेरे दर्दों का लगा आज मेला है,

इस तरह दर्दों का घेरा है।


जिंदगी-मौत दोनों ही संग संग रहे,

जाने जीवन में कितने थपेड़े सहे।

हर थपेड़ा हुआ आज मेरा है,

इस तरह दर्दों का घेरा है।


[२] 

जगते रहते


जो जग में जगते रहते वे लक्ष्य शिखर पर है चढ़ते,

घोर साधना की वेदी पर इतिहास नया वे ही रचते।


और जिन्हें आलस्य घेरता वे चोट विफलता की पाते,

मुरझाया चेहरा मन धुंधला पग-पग ठोकर भी खाते ।


दूर साधना से है जो जीवन में ज्योति नही भरते,

इस धरती पर ऐसे मानव ज्योतित नाम नहीं करते ।


मंगलेश डबराल समकालीन हिन्दी कवियों में सबसे चर्चित नाम हैं. इनका जन्म १६ मई १९४८ को टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड के काफलपानी गाँव में हुआ था. मंगलेश डबराल के पाँच काव्य संग्रह प्रकाशित हुए हैं. पहाड़ पर लालटेन, घर का रास्ता, हम जो देखते हैं, आवाज भी एक जगह है और नये युग में शत्रु. इसके अतिरिक्त इनके दो गद्य संग्रह लेखक की रोटी और कवि का अकेलापन के साथ ही एक यात्रावृत्त एक बार आयोवा भी प्रकाशित हो चुके हैं. उन्हें दिल्ली हिन्दी अकादमी के साहित्यकार सम्मान, कुमार विकल स्मृति पुरस्कार और अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना हम जो देखते हैं के लिए साहित्य अकादमी द्वारा सन् २००० में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है . प्रस्तुत हैं उनकी कविताएं - 


[१]

पत्तो कि मृत्यु 

कितने सारे पत्ते उड़कर आते हैं

चेहरे पर मेरे बचपन के पेड़ों से

एक झील अपनी लहरें

मुझ तक भेजती है

लहर की तरह काँपती है रात

और उस पर मैं चलता हूँ

चेहरे पर पत्तों की मृत्यु लिए हुए


चिड़िया अपने हिस्से की आवाज़ें

कर चुकी हैं, लोग जा चुके हैं

रोशनियाँ राख हो चुकी हैं

सड़क के दोनों ओर

घरों के दरवाज़े बन्द हैं

मैं आवाज़ देता हूँ

और वही लौट आती है मेरे पास ।


[२]

गुमशुदा 

शहर के पेशाबघरों और अन्य लोकप्रिय जगहों में

उन गुमशुदा लोगों की तलाश के पोस्टर

अब भी चिपके दिखते हैं

जो कई बरस पहले दस बारह साल की उम्र में

बिना बताए घरों से निकले थे

पोस्टरों के अनुसार उनका क़द मँझोला है

रंग गोरा नहीं गेहुँआ या साँवला है

हवाई चप्पल पहने हैं

चेहरे पर किसी चोट का निशान है

और उनकी माँएँ उनके बगै़र रोती रह्ती हैं

पोस्टरों के अन्त में यह आश्वासन भी रहता है

कि लापता की ख़बर देने वाले को मिलेगा

यथासंभव उचित ईनाम


तब भी वे किसी की पहचान में नहीं आते

पोस्टरों में छपी धुँधँली तस्वीरों से

उनका हुलिया नहीं मिलता

उनकी शुरुआती उदासी पर

अब तकलीफ़ें झेलने की ताब है

शहर के मौसम के हिसाब से बदलते गए हैं उनके चेहरे

कम खाते कम सोते कम बोलते

लगातार अपने पते बदलते

सरल और कठिन दिनों को एक जैसा बिताते

अब वे एक दूसरी ही दुनिया में हैं

कुछ कुतूहल के साथ

अपनी गुमशुदगी के पोस्टर देखते हुए

जिन्हें उनके माता पिता जब तब छ्पवाते रहते हैं

जिनमें अब भी दस या बारह

लिखी होती है उनकी उम्र ।


लीलाधर जगूड़ी का जन्म 1 जुलाई १९४४ धंगड़गाँव, टिहरी-गढ़वाल जिला, उत्तराखंड में हुआ था . वे हिंदी के लोकप्रिय कवि हैं. उनकी प्रमुख कृतियां -कविता संग्रह: शंखमुखी शिखरों पर, नाटक जारी है, इस यात्रा में, रात अब भी मौजूद है, बची हुई पृथ्वी, घबराए हुए शब्द, भय भी शक्ति देता है, अनुभव के आकाश में चाँद, महाकाव्य के बिना, ईश्वर की अध्यक्षता में, खबर का मुँह विज्ञापन से ढँका है. नाटक: पाँच बेटे. गद्य: मेरे साक्षात्कार आदि हैं. लीलाधर जगूड़ी को हिंदी साहित्य हेतु विभिन्न पुरस्कारों व सम्मानों से नवाजा गया है, जिनमें साहित्य अकादमी पुरस्कार (१९९७),पद्मश्री सम्मान,रघुवीर सहाय सम्मान, भारतीय भाषा परिषद् शतदल सम्मान, नमित पुरस्कार आकाशवाणी पुरस्कार, व्यास सम्मान (२०१८) प्रमुख हैं. प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताएं -


[१]

चिड़िया का प्रसव 

माँ उस पुरानी घटना का नाम है


अपने पेट में अंडे ले कर


ण चिड़िया बाजार में गई


लाला के आगे से सुतली


घोड़े के आगे से घास


बूचड़ के आगे से बकरी के बाल


बच्चे के आगे से कागज ला कर


उसने घोंसला बनाया


जिसका विरोध नहीं किया जा सकता


प्रसव से पहले चिड़िया ने


घोंसला बना लिया था


चिड़िया का विरोध आजादी का विरोध है


उस दरवाजे से बाहर। उस आकाश में


जो आईने के अंदर फँसा हुआ है


नई चिड़िया


उस चिड़िया के साथ रहना चाहती है


आईने के भीतर से जो चोंच लड़ाती है


आईना धोखा है


या चिड़िया खुद को नहीं पहचानती


मगर जितनी जिस रंग की आ जाएँ


उतनी उस रंग की वो दिखा देता है


चिड़िया उस परत को कमजोर बनाना चाहती है


जिसके पार दूसरी चिड़िया फँसी है


तो भी उसका विरोध नहीं किया जा सकता


क्योंकि आईना भी एक दीवार है


चोंच चाहे बड़ी हो चाहे छोटी


भूख का जलजला एक है


चींटी जिसे ले गई


हाथी वो कण नहीं उठा सका


पानी जितना चिड़िया ने पिया


नदी कभी समुद्र तक नहीं पहुँचा सकी


एक चिड़िया की भूख


एक चींटी की भूख


एक हाथी की भूख;


भूख चाहे किसी की हो


- मार एक है


शांति में, खामोशी में, सन्नाटे में


तसल्ली के बाद जो पैदा होती है


माँ उस इच्छा का नाम है।


[२]अपने अंदर से बाहर आ जाओ


हर चीज यहाँ किसी न किसी के अंदर है


हर भीतर जैसे बाहर के अंदर है


फैल कर भी सारा का सारा बाहर


ब्रह्मांड के अंदर है


बाहर सुंदर है क्योंकि वह किसी के अंदर है


मैं सारे अंदर बाहर का एक छोटा सा मॉडल हूँ


दिखते-अदिखते प्रतिबिंबों से बना


अबिंबित जिसमें


किसी नए बिंब की संभावना-सा ज्यादा सुंदर है


भीतर से यादा बाहर सुंदर है


क्योंकि वह ब्रह्मांड के अंदर है


भविष्य के भीतर हूँ मैं जिसका प्रसार बाहर है


बाहर देखने की मेरी इच्छा की यह बड़ी इच्छा है


कि जो भी बाहर है वह किसी के अंदर है


तभी वह सँभला हुआ तभी वह सुंदर है


तुम अपने बाहर को अंदर जान कर


अपने अंदर से बाहर आ जाओ ।