[Kavishala Labs] जब प्यार का जूनून और जुदाई का दर्द दिल में बैठ जाये तो इंसान या तो सुध बुध खो बैठता है या फिर अपने दर्द को कविता में पिरो कर खुद को सुकून देता है. और जब कविता में दर्द और प्यार का जूनून शामिल हो तो लोग उसके दीवाने हो जाते है, भले ही लोग उस कवि या शायर को नहीं जानते हो, जिसके दर्द में डूबे गीत वो अपना समझते हैं ..
अपने दर्द भरे गीतों से लोगों को दीवाना बना देने वाले शिव कुमार बटालवी ऐसे ही कवि थे, जिनके "इक कुड़ी जिहदा नाम मुहब्बत
गुम है गुम है गुम है!" जैसे दर्द भरे गीत लोगो की जुबान पर बस गए, जिनके गीतों को कई मशहूर गायकों ने अपनी आवाज दी, लेकिन बहुत ही कम लोग शिव कुमार बटालवी को जानते हैं.
शिवा कुमार बटालवी का जन्म सियालकोट (पाकिस्तान) के गांव बड़ा पिंड लोहतियां में 23 जुलाई 1936 के दिन हुआ था. कुछ लोग उनका जन्म 7 अक्टूबर 1937 बताते है .बटालवी जी के बचपन का कुछ समय गाँव में ही बीता . उन्होंने अपने गांव की मिट्टी, खेतों की फसलों, त्योहारों और मेलों को भरपूर जिया. गांव के प्रति उनका लगाव उनकी कविता में देखने को मिलता है.
कहते है कि जब वो किशोर थे तब गांव के मेले में एक लड़की से उनको प्यार हो गया. जिसका नाम मैना था, मैना को खोजते हुए बटालवी उसके गांव तक गये थे. उस लड़की के भाई से दोस्ती गांठी ली थी. और दोस्त से मिलने के नाम पर वो रोज मैना के गांव चले जाते. लेकिन बीमारी कि वजह से मैना कि मौत हो गयी. बटालवी मैना से बेइंतेहा प्यार करते थे, मैना की मौत ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया था .अपने प्यार के गम में बटालवी ने एक मैना शीर्षक से एक लंबी कविता लिखी थी.
कुछ समय गुजरने के बाद उन्हें पंजाबी लेखक गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी की बेटी से प्यार हो गया. लेकिन दोनों के बीच जाति भेद होने के कारण उनका विवाह नहीं हो पाया .. अपने पहले प्यार की मौत और इस गुम हुई लकड़ी की विरह वेदना में डूब कर शिव ने ‘इश्तेहार’ शीर्षक से कविता लिखी, उनकी कविता बहुत लोकप्रिय हुई, वो कविता थी-
गुम है गुम है गुम है
इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है
सूरत उसदी परियां वरगी
सीरत दी ओह मरियम लगदी
हसदी है तां फुल्ल झड़दे ने
तुरदी है तां ग़ज़ल है लगदी
लम्म सलम्मी सरूं क़द दी
उम्र अजे है मर के अग्ग दी
अमृता प्रीतम ने बटालवी को “बिरह का सुल्तान” कहा था :- पहली लड़की जिससे शिव ने प्यार किया उसकी मौत का गम और दूसरी मोहब्बत से विरह की वेदना मिलने के बाद शिव ने अपने गम को अपने गीतों में पिरोना शुरू कर दिया . उनकी कविताओं में विरह का दर्द व मोहब्बत की जुस्तजू साफ़ देखने को मिलती है .इनकी कविताओं में दर्द को देख कर अमृता प्रीतम ने इन्हें “बिरह का सुल्तान” कहा था. बटालवी का दर्द उनकी इस रचना में साफ़ झलकता है.
एह मेरा गीत किसे ना गाणा
एह मेरा गीत मैं आपे गा के
भलके ही मर जाणा.
[अर्थात्- ये मेरे गीत किसी को नहीं गाने, ये मेरे गीत मुझे खुद ही गा के, अगले दिन मर जाना है.]
उनकी कविता को देख कर लगता है मानो बटालवी को बस मौत का ही इंतजार था . अमृता प्रीतम ने बटालवी लिये एक बार कहा; “बस कर वीरा अब यह दर्द और नहीं सुन सकती ” विरह की वेदना में डूबे बटालवी की ये पंक्तियाँ दर्शाती है कि वो किस बेसब्री से मौत का इंतजार कर रहे थे -
मैंनू विदा करो [मुझे विदा करो]
असां ते जोबन रुत्ते मरना,
मर जाणां असां भरे भराए,
हिजर तेरे दी कर परिकरमा..
[अर्थात- हमें तो यौवन की ऋतु में मरना है, मर जाएंगे हम भरे पूरे, तुम से जुदाई की परिक्रमा पूरी करके..]
महज 35 साल कि उम्र में दुनिया को कह गए अलविदा :- अपने गीतों और कविताओं से लोगों के दिलों पर राज करने वाले बटालवी ने भले ही कम उम्र पायी हो लेकिन जितनी भी उम्र पायी उसको उन्होंने जी भर जिया. उन्हें 28 साल की उमर में साहित्य अकादमी पुरुष्कार मिला , वो आखिरी साँस तक दर्द में जीते रहे या यूँ कहें कि दर्द को जीते रहे और अपनी दिल की बेताबी को कविताओं में रचते रहे. 6 May 1973, को 35 साल की अल्पायु में वो दुनिया को अलविदा कह गए. भले ही बटालवी आज हमारे बीच नहीं है लेकिन अपने गीते के जरिये वो हमेशा लोगो के दिलों में ज़िंदा रहेंगे.

