[Kavishala Labs]हिंदी साहित्य में कई श्रेष्ठ कवि हुए हैं. जिन्होंने अपनी कविताओं से समाज को राह दिखाई. हिंदी साहित्य के कवियों ने मानव मन की जिज्ञासा, उत्सुकता व मर्म को समझा व उसी के अनुरूप कविता रची. यही कारण है इन कवियों की कविताएं अनायास ही किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेती है. श्याम नारायण पाण्डेय एक ऐसे ही कवि थें जिनकी कविताओं ने लोगो को आकर्षित किया.
श्याम नारायण पाण्डेय हिन्दी कवि थे. उनकी ख्याति मुख्य रूप से उनकी वीर रस की श्रेष्ठ कविताओं की वजह से है. वह केवल कवि ही नहीं अपितु अपनी ओजस्वी वाणी में वीर रस काव्य के अनन्यतम प्रस्तोता भी थे. उनका जन्म सन् 1907 में ग्राम डुमराँव, जिला मऊ, (उत्तर प्रदेश) में हुआ था. श्याम नारायण पाण्डेय की तुलना रीतिकाल के श्रेष्ठ वीर रस के कवि भूषण से की जाती है.
श्याम नारायण पाण्डेय ने कई उत्कृष्ट काव्य रचनाएं रची है. उन्होंने चार उत्कृष्ट महाकाव्य रचे, जिनमें हल्दीघाटी (काव्य) सर्वाधिक लोकप्रिय और जौहर (काव्य) विशेष रूप से प्रसिद्द है. हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप के जीवन और जौहर में चित्तौड की रानी पद्मिनी के जीवन, वीरता व बलिदान का व्याख्यान किया गया है. हल्दीघाटी के नाम से विख्यात राजस्थान की इस ऐतिहासिक वीर भूमि के लोकप्रिय नाम पर लिखे गये हल्दीघाटी महाकाव्य पर उनको तत्कालीन समय का सर्वश्रेष्ठ सम्मान देव पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. उनकी आवाज कर्णप्रिय व सम्मोहित करने वाली थी. अपनी ओजस्वी वाणी के कारण वे कवि सम्मेलन के मंचों पर लोकप्रिय थे. काव्य पाठ की उनकी शैली श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती थी. हल्दीघाटी, जौहर, तुमुल, रूपान्तर, आरती, जय-पराजय, गोरा-वध, परशुराम, जय हनुमान और शिवाजी (महाकाव्य) उनकी उनकी प्रमुख रचनाएं हैं.
पढ़िए उनकी कुछ रचनाएं.
[१]
रण बीच चौकड़ी भर-भर कर
चेतक बन गया निराला था
राणाप्रताप के घोड़े से
पड़ गया हवा का पाला था
जो तनिक हवा से बाग हिली
लेकर सवार उड़ जाता था
राणा की पुतली फिरी नहीं
तब तक चेतक मुड़ जाता था
गिरता न कभी चेतक तन पर
राणाप्रताप का कोड़ा था
वह दौड़ रहा अरिमस्तक पर
वह आसमान का घोड़ा था
था यहीं रहा अब यहाँ नहीं
वह वहीं रहा था यहाँ नहीं
थी जगह न कोई जहाँ नहीं
किस अरिमस्तक पर कहाँ नहीं
निर्भीक गया वह ढालों में
सरपट दौडा करबालों में
फँस गया शत्रु की चालों में
बढ़ते नद-सा वह लहर गया
फिर गया गया फिर ठहर गया
विकराल वज्रमय बादल-सा
अरि की सेना पर घहर गया
भाला गिर गया गिरा निसंग
हय टापों से खन गया अंग
बैरी समाज रह गया दंग
घोड़े का ऐसा देख रंग
[२]
था शीत भगाने को
माधव की उधर तयारी थी।
वैरी निकालने को निकली
राणा की इधर सवारी थी॥1॥
थे उधर लाल वन के पलास¸
थी लाल अबीर गुलाल लाल।
थे इधर क्रोध से संगर के
सैनिक के आनन लाल–लाल॥2॥
उस ओर काटने चले खेत
कर में किसान हथियार लिये।
अरि–कण्ठ काटने चले वीर
इस ओर प्रखर तलवार लिये॥3॥
उस ओर आम पर कोयल ने
जादू भरकर वंशी टेरी।
इस ओर बजाई वीर–व्रती
राणा प्रताप ने रण–भेरी॥4॥
सुनकर भेरी का नाद उधर
रण करने को शहबाज चला।
लेकर नंगी तलवार इधर
रणधीरों का सिरताज चला॥5॥
दोनों ने दोनों को देखा¸
दोनों की थी उन्नत छाती।
दोनों की निकली एक साथ
तलवार म्यान से बल खाती॥6॥
[३]
चढ़ चेतक पर तलवार उठा,
रखता था भूतल पानी को।
राणा प्रताप सिर काट काट,
करता था सफल जवानी को॥
कलकल बहती थी रणगंगा,
अरिदल को डूब नहाने को।
तलवार वीर की नाव बनी,
चटपट उस पार लगाने को॥
वैरी दल को ललकार गिरी,
वह नागिन सी फुफकार गिरी।
था शोर मौत से बचो बचो,
तलवार गिरी तलवार गिरी॥
पैदल, हयदल, गजदल में,
छप छप करती वह निकल गई।
क्षण कहाँ गई कुछ पता न फिर,
देखो चम-चम वह निकल गई॥
क्षण इधर गई क्षण उधर गई,
क्षण चढ़ी बाढ़ सी उतर गई।
था प्रलय चमकती जिधर गई,
क्षण शोर हो गया किधर गई॥
लहराती थी सिर काट काट,
बलखाती थी भू पाट पाट।
बिखराती अवयव बाट बाट,
तनती थी लोहू चाट चाट॥
क्षण भीषण हलचल मचा मचा,
राणा कर की तलवार बढ़ी।
था शोर रक्त पीने को यह,
रण-चंडी जीभ पसार बढ़ी॥

