कविता हिंदी साहित्य की एक अलौकिक विधा है. कविता की सम्पूर्ण शक्ति, आकर्षण और सामर्थ्य रसो पर ही निहित है. जिस प्रकार आत्मा के बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं है ठीक उसी प्रकार रस के बिना कविता की कल्पना भी संभव नहीं है. मानव मन के भावों को शब्दों में पिरोकर कविता जो अचंभित करने वाली क्रिया करती है, यह रसो का ही प्रभाव है.
श्रव्य काव्य के पठन अथवा श्रवण से जो अलौकिक आनन्द की अनुभूति होती है, वही काव्य में रस कहलाता है. रस के जिस भाव से यह अनुभूति होती है उसे स्थायी भाव होता है. रस, छंद और अलंकार - काव्य रचना के आवश्यक अव्यय हैं.रस का शाब्दिक अर्थ है - निचोड़. काव्य में जो आनन्द आता है वह ही काव्य का रस है। काव्य में आने वाला आनन्द अर्थात् रस लौकिक न होकर अलौकिक होता है. रस काव्य की आत्मा है. संस्कृत में कहा गया है कि "रसात्मकम् वाक्यम् काव्यम्" अर्थात् रसयुक्त वाक्य ही काव्य है.
हिंदी काव्य में श्रृंगार रस को रसराज अर्थात रसो का राजा कहा गया है. हिंदी साहित्य के कवियों ने श्रृंगार रस का प्रयोग अपनी कविताओं में बड़े ही प्रभावी ढंग से किया है. प्रस्तुत है श्रृंगार रस की महत्ता, सार्थकता व सामर्थ्य को व्यक्त करतीं कुछ श्रेष्ठ कवियों की कविताएं.
(१)धर्मवीर भारती (२५ दिसंबर, १९२६- ४ सितंबर, १९९७) आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रमुख लेखक, कवि, नाटककार और सामाजिक विचारक थे. वे एक समय की प्रख्यात साप्ताहिक पत्रिका धर्मयुग के प्रधान संपादक भी थे. प्रस्तुत हैं उनकी श्रृंगार रस की दो कविताएं
[१]
अगर मैंने किसी के होठ के पाटल कभी चूमे
अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे
महज इससे किसी का प्यार मुझको पाप कैसे हो?
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?
तुम्हारा मन अगर सींचूं
गुलाबी तन अगर सींचूं, तरल मलयज झकोरों से!
तुम्हारा चित्र खींचूं प्यास के रंगीन डोरों से
कली-सा तन, किरन-सा मन, शिथिल सतरंगिया आंचल
उसी में खिल पड़ें यदि भूल से कुछ होठ के पाटल
किसी के होठ पर झुक जाएं कच्चे नैन के बादल
महज इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो?
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?
किसी की गोद में सिर धर
घटा घनघोर बिखराकर, अगर विश्वास हो जाए
धड़कते वक्ष पर मेरा अगर अस्तित्व खो जाए?
न हो यह वासना तो जिंदगी की माप कैसे हो?
किसी के रूप का सम्मान मुझ पर पाप कैसे हो?
नसों का रेशमी तूफान मुझ पर शाप कैसे हो?
किसी की सांस मैं चुन दूं
किसी के होठ पर बुन दूं अगर अंगूर की पर्तें
प्रणय में निभ नहीं पातीं कभी इस तौर की शर्तें
यहां तो हर कदम पर स्वर्ग की पगडण्डियां घूमीं
अगर मैंने किसी की मदभरी अंगड़ाइयां चूमीं
अगर मैंने किसी की सांस की पुरवाइयां चूमीं
महज इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो?
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?
[२]
बरबाद मेरी जिंदगी
इन फिरोजी होठों पर
गुलाबी पांखुरी पर हल्की सुरमई आभा
कि ज्यों करवट बदल लेती कभी बरसात की दुपहर
इन फिरोजी होठों पर
तुम्हारे स्पर्श की बादल-धुली कचनार नरमाई
तुम्हारे वक्ष की जादू भरी मदहोश गरमाई
तुम्हारी चितवनों में नर्गिसों की पांत शरमाई
किसी की मोल पर मैं आज अपने को लुटा सकता
सिखाने को कहा
मुझसे प्रणय के देवताओं ने
तुम्हें आदिम गुनाहों का अजब-सा इन्द्रधनुषी स्वाद
मेरी जिंदगी बरबाद!
अंधेरी रात में खिलते हुए बेले-सरीखा मन
मृणालों की मुलायम बांह ने सीखी नहीं उलझन
सुहागन लाज में लिपटा शरद की धूप जैसा तन
पंखुड़ियों पर भंवर-सा मन टूटता जाता
मुझे तो वासना का
विष हमेशा बन गया अमृत
बशर्ते वासना भी हो तुम्हारे रूप से आबाद
मेरी जिंदगी बरबाद!
गुनाहों से कभी मैली पड़ी बेदाग तरुणाई
सितारों की जलन से बादलों पर आंच कब आई
न चन्दा को कभी व्यापी अमा की घोर कजराई
बड़ा मासूम होता है गुनाहों का समर्पण भी
हमेशा आदमी
मजबूर होकर लौट आता है
जहां हर मुक्ति के, हर त्याग के, हर साधना के बाद
मेरी जिंदगी बरबाद!
(२) मैथिलीशरण गुप्त (३ अगस्त १८८६ – १२ दिसम्बर १९६४) हिन्दी के प्रसिद्ध कवि थे. हिन्दी साहित्य के इतिहास में वे खड़ी बोली के प्रथम महत्त्वपूर्ण कवि माने जाते है. प्रस्तुत है श्रृंगार रस से सुसज्जित उनकी कविता -
[१[
मदिराधर चुंबन, प्रसन्न मन,
मेरा यही भजन औ पूजन!
प्रकृति वधू से पूछा मैंने
प्रेयसि, तुझको दूँ क्या स्त्री-धन?
बोली, प्रिय, तेरा प्रसन्न मन
मेरा यौतुक, मेरा स्त्री धन!
[३] सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (२१ फरवरी, १८९६ - १५ अक्टूबर, १९६१) हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ कवियों में से एक थें.उनकी काव्यकला की सबसे बड़ी विशेषता है चित्रण-कौशल. आंतरिक भाव हो या बाह्य जगत के दृश्य-रूप, संगीतात्मक ध्वनियां हो या रंग और गंध, सजीव चरित्र हों या प्राकृतिक दृश्य, सभी अलग-अलग लगनेवाले तत्त्वों को घुला-मिलाकर निराला ऐसा जीवंत चित्र उपस्थित करते हैं कि पढ़ने वाला उन चित्रों के माध्यम से ही निराला के मर्म तक पहुँच सकता है. प्रस्तुत है श्रृंगार रस पर लिखी हुई उनकी कविता -
[१]
लहर रही शशिकिरण चूम निर्मल यमुनाजल,
चूम सरित की सलिल राशि खिल रहे कुमुद दल
कुमुदों के स्मिति-मन्द खुले वे अधर चूमकर,
बही वायु स्वच्छंद, सकल पथ घूम-घूमकर
है चूम रही इस रात को वही तुम्हारे मधु अधर
जिनमें हैं भाव भरे हुए सकल-शोक-सन्तापहर!
(४) गोपालदास नीरज (4 जनवरी 1925 - 19 जुलाई 2018), हिन्दी साहित्यकार, शिक्षक, एवं कवि सम्मेलनों के मंचों पर काव्य वाचक एवं फ़िल्मों के गीत लेखक थे. वे पहले व्यक्ति थे जिन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भारत सरकार ने दो-दो बार सम्मानित किया, पहले पद्म श्री से, उसके बाद पद्म भूषण से. यही नहीं, फ़िल्मों में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिये उन्हें लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला. प्रस्तुत है उनकी श्रृंगार रस की कविता -
[१]
धनिकों के तो धन हैं लाखों
मुझ निर्धन के धन बस तुम हो!
कोई पहने माणिक माल
कोई लाल जुड़ावे
कोई रचे महावर मेंहदी
मुतियन मांग भरावे
सोने वाले चांदी वाले
पानी वाले पत्थर वाले
तन के तो लाखों सिंगार हैं
मन के आभूषण बस तुम हो!
धनिकों के तो धन हैं लाखों
मुझ निर्धन के धन बस तुम हो!
कोई जावे पुरी द्वारिका
कोई ध्यावे काशी
कोई तपे त्रिवेणी संगम
कोई मथुरा वासी
उत्तर-दक्खिन, पूरब-पच्छिम
भीतर बाहर, सब जग जाहर
संतों के सौ-सौ तीरथ हैं
मेरे वृन्दावन बस तुम हो!
धनिकों के तो धन हैं लाखों
मुझ निर्धन के धन बस तुम हो!
कोई करे गुमान रूप पर
कोई बल पर झूमे
कोई मारे डींग ज्ञान की
कोई धन पर घूमे
काया-माया, जोरू-जाता
जस-अपजस, सुख-दुःख, त्रिय-तापा
जीता मरता जग सौ विधि से
मेरे जन्म-मरण बस तुम हो!
धनिकों के तो धन हैं लाखों
मुझ निर्धन के धन बस तुम हो!
[५] अशोक वाजपेयी समकालीन हिंदी साहित्य के एक प्रमुख साहित्यकार हैं. वाजपेयी जी अपनी कविताओं की वजह से प्रसिद्ध है. 'कहीं नहीं वहीं' काव्य संग्रह के लिए सन् 1994 में वाजपेयी जी को भारत सरकार द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया. प्रस्तुत है उनकी शृंगार रस की कविता -
[१]
एक जीवित पत्थर की दो पत्तियाँ
रक्ताभ, उत्सुक
काँपकर जुड़ गई
मैंने देखा
मैं फूल खिला सकता हूँ।

