होंगे कामयाब, होंगे कामयाब
हम होंगे कामयाब एक दिन
हो-हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम होंगे कामयाब एक दिन
[Kavishala Labs] ये गीत आपने जरूर सुना और गुनगुनाया होगा. हो सकता है कि अभी आप इस गीत को मन ही मन गुनगुना रहे हो. यह गीत लिखा था गिरिजाकुमार माथुर ने. गीतों और कविताओं की दुनिया में गिरिजाकुमार माथुर ने एक अलग ही आयाम रचा. उनके गीत और उनकी कविताएं सहज किन्तु अपनी ओर आकर्षित करने वाली है. अपने समकालीन कवियों में गिरिजाकुमार माथुर को जो चीज अलग और विशेष बनाती है वह है मानव मन की उनकी समझ. उनकी रचनाएँ किसी के भी मन में उतर जाती है. और सहज इतनी कि बस एक बार सुन लेने पर स्मृति में बस जाती हैं.
गिरिजाकुमार माथुर (22 अगस्त 1919 - 10 जनवरी 1994) एक कवि, नाटककार और समालोचक के रूप में जाने जाते हैं. उनकी कविता में रंग, रूप, रस, भाव तथा शिल्प के नए-नए प्रयोग देखने को मिलते हैं. उन्होंने कविताओं में जो भी प्रयोग किए उनका लक्ष्य ‘व्यापक सत्य’ को प्रस्तुत करना था. उनकी कविताओं में यथार्थ और सौंदर्य का संतुलित समन्वय है. उन्होंने 'ऑल इंडिया रेडियो' में अनेक महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए अंग्रेजी और उर्दू के वर्चस्व के बीच हिन्दी को पहचान दिलाई.
गिरिजा कुमार माथुर ने काव्य रचना की शुरुआत 1934 में ब्रजभाषा के परम्परागत कवित्त-सवैया लेखन से की. उन पर माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन आदि की रचनाओं का काफी प्रभाव पड़ा. उन्होंने अपने प्रथम काव्य संग्रह 'मंजीर' की भूमिका सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी से लिखवायी. उनकी रचना का प्रारम्भ द्वितीय विश्वयुद्ध की घटनाओं से उत्पन्न प्रतिक्रियाओं से युक्त है तथा भारत में चल रहे राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन से प्रभावित है. अज्ञेय द्वारा सम्पादित एवं प्रकाशित 'तारसप्तक' के सात कवियों में से एक कवि गिरिजाकुमार भी हैं.
उन्होंने कविता के अलावा एकांकी नाटक, आलोचना, गीति-काव्य तथा शास्त्रीय विषयों पर भी रचनाएँ की है. भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद की साहित्यिक पत्रिका 'गगनांचल' का संपादन करने के अलावा उन्होंने कहानी, नाटक तथा आलोचनाएँ भी लिखी हैं. गिरिराज कुमार के नाटकों और एकांकियों में पौराणिक संदर्भ कम देखने को मिलता है. उन्होंने निकट इतिहास की घटनाओं को कथ्य के रूप में प्रयोग किया है. रेडियो की समय-सीमा के मद्दे नजर उन्होंने छोटे नाटक लिखे हैं. अपने पात्रों को दैनिक बोलचाल की भाषा प्रदान की है, जो बेहद महत्त्वपूर्ण है.
हिंदी साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें साहित्य अकादमी, व्यास सम्मान व शलाका से सम्मानित किया गया. कविताओं में वैज्ञानिकता और वैचारिकता के प्रवाह के अनूठे प्रयोग के कारण उनकी एक अलग पहचान स्थापित है.
पढ़िए उनकी कुछ कविताएं -
[१]
होंगे कामयाब, होंगे कामयाब
हम होंगे कामयाब एक दिन
हो-हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम होंगे कामयाब एक दिन
होंगी शांति चारो ओर
होंगी शांति चारो ओर
होंगी शांति चारो ओर एक दिन
हो-हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
होंगी शांति चारो ओर एक दिन
हम चलेंगे साथ-साथ
डाल हाथों में हाथ
हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन
हो-हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन
नहीं डर किसी का आज
नहीं भय किसी का आज
नहीं डर किसी का आज के दिन
हो-हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
नहीं डर किसी का आज के दिन
हम होंगे कामयाब एक दिन
[२]
एक डोर में सबको जो है बाँधती
वह हिंदी है,
हर भाषा को सगी बहन जो मानती
वह हिंदी है।
भरी-पूरी हों सभी बोलियां
यही कामना हिंदी है,
गहरी हो पहचान आपसी
यही साधना हिंदी है,
सौत विदेशी रहे न रानी
यही भावना हिंदी है।
तत्सम, तद्भव, देश विदेशी
सब रंगों को अपनाती,
जैसे आप बोलना चाहें
वही मधुर, वह मन भाती,
नए अर्थ के रूप धारती
हर प्रदेश की माटी पर,
'खाली-पीली-बोम-मारती'
बंबई की चौपाटी पर,
चौरंगी से चली नवेली
प्रीति-पियासी हिंदी है,
बहुत-बहुत तुम हमको लगती
'भालो-बाशी', हिंदी है।
उच्च वर्ग की प्रिय अंग्रेज़ी
हिंदी जन की बोली है,
वर्ग-भेद को ख़त्म करेगी
हिंदी वह हमजोली है,
सागर में मिलती धाराएँ
हिंदी सबकी संगम है,
शब्द, नाद, लिपि से भी आगे
एक भरोसा अनुपम है,
गंगा कावेरी की धारा
साथ मिलाती हिंदी है,
पूरब-पश्चिम/ कमल-पंखुरी
सेतु बनाती हिंदी है।
[३]
छाया मत छूना, मन
होगा दुख दूना, मन
जीवन में हैं सुरंग सुधियाँ सुहावनी
छवियों की चित्र गन्ध फैली मनभावनी
तन सुगन्ध शेष रही बीत गई यामिनी
कुन्तल के फूलों की याद बनी चाँदनी
भूली-सी एक छुअन
बनता हर जीवित क्षण
यश है, न वैभव, मान है, न सरमाया
जितना ही दौड़ा तू उतना ही भरमाया
प्रभुता का शरण-बिम्ब केवल मृगतृष्णा है
हर चंदिरा में छिपी एक रात कृष्णा है
जो है यथार्थ कठिन
उसका तू कर पूजन
छाया मत छूना, मन
होगा दुख दूना, मन
दुविधा हत-साहस है दिखता है पन्थ नहीं
देह सुखी हो पर मन के दु:ख का अन्त नहीं
दु:ख है, न चाँद खिला शरद रात आने पर
क्या हुआ जो खिला फूल रस-वसन्त जाने पर
जो न मिला भूल उसे
कर तू भविष्य वरण
छाया मत छूना, मन
होगा दुख दूना, मन
[4]
उन पर क्या विश्वास जिन्हें है अपने पर विश्वास नहीं
वे क्या दिशा दिखाएँगे, दिखता जिनको आकाश नहीं
बहुत बड़े सतरंगे नक्शे पर
बहुत बड़ी शतरंज बिछी
धब्बोंवाली चादर जिसकी
कटी, फटी, टेढ़ी, तिरछी
जुटे हुए हैं वही खिलाड़ी
चाल वही, संकल्प वही
सबके वही पियादे, फर्जी
कोई नया विकल्प नहीं
चढ़ा खेल का नशा इन्हें, दुनिया का होश-हवास नहीं
दर्द बँटाएँगे क्या, जिनको अपने से अवकाश नहीं
एक बाँझ वर्जित प्रदेश में
पहुँच गई जीवन की धारा
भटक रहा लाचार कारवाँ
लुटा-पिटा दर-दर मारा
बिक्री को तैयार खड़ा
हर दरवाजे झुकनेवाला
अदल-बदल कर पहन रहा है
खोटे सिक्कों की माला
इन्हें सबसे ज्यादा दुख का है कोई अहसास नहीं
अपनी सुख-सुविधा के आगे, कोई और तलाश नहीं
खत्म हुई पहचान सभी की
अजब वक्त यह आया है
सत्य झूठ का व्यर्थ झमेला
सबने खूब मिटाया है
जातिवाद का जहर किसी ने
घर-घर में फैलाया है
वर्तमान है वृद्ध
भविष्यत अपने से कतराया है
उठती हैं तूफानी लहरें, तट का है आभास नहीं
पृथ्वी है, सागर सूरज है लेकिन अभी प्रकाश नहीं।
।

